मैं रावण… भविष्य का तीर्थंकर! – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज

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लेखक- मुनि श्री पूज्य सागर महाराज ,पुष्पगिरि

पूरा देश मुझे यानि रावण को जलाने के लिए मेरा पुतला बनाने में जुट गया है… अब जलाने के लिए मेरा प्रतीक पुतला तो बनाओगे ही ना। मैं रावण, एक प्रकाण्ड पंड़ित, अनन्य ईश्वर भक्त, विद्वान, अत्यंत बलशाली पर आज मुझे इस तरह कोई नहीं जानता, सब मुझे केवल और केवल बुराई के प्रतीक स्वरूप जानते हैं, पर क्या आप मेरी बुराई से शिक्षा ले सके हैं? शायद नहीं वरना मुझे जलाने वाले लोग रावण नहीं राम होते? मैं आज आपको बताता हूँ कि मैं भविष्य में तीर्थंकर होने वाला हूँ। तीर्थंकर ( परमात्मा)… होने के लिए मुझमें कुछ तो अच्छा रहा होगा ना। मैनें सोलहकारण भावनाओं का भाया होगा ना..! एक प्रश्न करता हूँ, क्या आप में से कोई मोक्ष पाना या तीर्थंकर होना नहीं चाहता, अगर चाहते हैं तो सुनिए, जानिए और धारण कीजिए मेरे वो गुण जिनके कारण मैं, मैं से मुक्त होने की पात्रता पा सका हूँ। मैं जगत से मुक्त होने का बंध बना चुका हूँ, मैं जीवन-मरण से मुक्त होने वाला हूँ, मैं परमपद को प्राप्त करने का अधिकारी बन चुका हूँ, मैं भविष्य का तीर्थंकर होने वाला हूँ।

एक मुलाकात… सच्चे और अच्छे रावण से!

चलिए आज मैं आपको परिचय करवाता हूँ नए रावण से… यानि मुझसे! जब आप मुझे जलाते हो, मेरा नाम सुनते ही आपको क्रोध आता है, आप मुझे सदा बुरा ही कहते हो! तब मुझे दु:ख नहीं होता, आप पर तरस आता है कि आप किस ओर जा रहे हो। आप मेरे बुरे को देख रहे हो फिर भी उससे सीख नहीं रहे और मेरे अच्छे गुणों तक तो आपकी सोच भी नहीं पहुँच रही है। आप एक ऐसे पुरुष का प्रतीक पुतला जला रहे हो जिसका जीव तीर्थंकर होने का अधिकारी है। मैं स्वीकार करता हूँ कि मेरी आँखों ने एक बार सीता को देख वासना का भाव उत्पन्न किया, पर मैंने उन्हें कभी स्पर्श तक नहीं किया फिर भी मुझे आज तक जलाया जा रहा है। एक बात बताइए कि मुझे जलाने वाले या जलाने में सहयोग करने वाले किस हक से मुझे जला रहे हैं क्या उनकी आँखों में वासना नहीं है। अरे! मुझे जलाने से पहले एक बार खुद के भीतर झांकिए तो सही। इस दशहरे यदि मुझे जलाने की अपेक्षा यदि अपनी आँखों में बसती वासना को जलाने का संकल्प करोगे तो जीवन सँवर जाएगा और मुझे तो इसी से संतुष्टि हो जाएगी कि मेरे भूत से किसी का भविष्य सुधर गया। मेरी एक बुराई की अपेक्षा यदि मेरे जीवन की अच्छी बातें यानि मेरे गुणों पर ध्यान दोगे तो यकीनन अपने जीवन में अशुभ कर्म से बच सकोगे । मेरी अच्छाईयों को जानकर आप भाव और द्रव्य हिंसा से बच सकते हो और मेरे यही दस भले रूप आपको कर्म सिद्धांत के खेल में विजयी बनाकर आपका भव और परभव संवार सकते हैं। आइए आपको एक नए और सकारात्मक नजरिए के साथ मिलवाता हूँ सच्चे और अच्छे रावण से, यानि खुद से… मेरे उन रूपों से जिन्हें मैं जानता हूँ और जिनके कारण ही मैंने तीर्थंकर नामकर्म का बंध पाया है।

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