महावीर जयन्ती: भगवान महावीर कहते हैं कि हमारे कर्मों का ही फल है सुख-दुख-अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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भगवान महावीर ने प्राणीमात्र को संयमित जीवन जीने और राग-द्वेषात्मक प्रवृत्ति से दूर रहने का उपदेश दिया है। महावीर जानते थे कि आने वाला समय दुःखों से भरा हुआ होगा। मनुष्य का मन, वचन और काय की क्रिया नकारात्मक रूप से अधिक भरी रहेगी। महावीर ने यह भी कहा था कि तुम दूसरों को देखने के बजाए अपने आपको देखना, अपनी चर्या को देखना। दूसरों के चक्कर में रहोगे तो स्वयं संसार के चक्कर लगाते रहोगे। जैसे भी परिस्थिति तुम्हारे सामने आए, उसमें ही रहना सीख लेना तभी सुखी रह पाओगे। महावीर को भविष्य की घटनाओं का अनुमान था। तभी तो उन्होंने कहा था कि सुख की मात्रा धीरे-धीरे कम होगी, इसलिए तुम सुख की अपेक्षा करने के बजाए दुःख में ही सुख का अनुभव करने की कला को सीख लेना। ऐसे में तुम जहां रहोगे, वहां सुख का अनुभव करोगे। महावीर कहते हैं कि तुम दुःखी हो, यह तुम्हें पता है। पर तुम क्यों रो-रोकर दूसरों को अपना दुख बताते हो और अपने आपको कमजोर बता रहे हो। क्यों तुम अपने मनोबल को कमजोर करते हो। कमजोर व्यक्ति न सकारात्मक सोच सकता है और न ही वर्तमान की परिस्थिति से लड़ सकता है। वर्तमान की परिस्थिति से लड़ने के लिए वर्तमान की परिस्थिति को समझना ही होगा तभी तो आत्मबल और मनोबल बढ़ेगा और तुम्हें विजयश्री मिल सकती है। यह तय है कि जीवन में जो दुःख आया है, वह हमारे अशुभ कर्मों का फल है। और यह भी तय है कि यह दुःख जाएगा भी हमारे शुभकर्मो के फल से ही। महावीर ने कहा कि मन,वचन और काय को पवित्र रखने के लिए सत्कार्य करना ही होता है।
तीर्थंकर महावीर कहते हैं कि कोई इंसान तुम्हारे साथ कुछ भी करे, पर तुम उसके लिए सकारात्मक ही रखना। हम फिर किस बात का इंतजार कर रहे हैं। महावीर कहते हैं कि अपने मन को प्रसन्न रखोगे तो मानसिक रोग नहीं होगा। अपने तन को प्रसन्न रखोगे तो शारीरिक रोग नहीं होगा और अपने वचन को स्वच्छ रखोगे तो आर्थिक रोग नहीं होगा। इन तीनों को पवित्र रखने के लिए महावीर ने अलग- अलग स्वरूप, शब्दों में शिक्षा दी है। तो आइए, अनर्थदण्डविरति व्रत शिक्षा पर चर्चा करते हैं ।

अनर्थदण्डविरति

जिससे अपना कुछ प्रयोजन तो सिद्ध न हो बल्कि व्यर्थ ही पाप का संचय होता हो, ऐसे कार्यों को अनर्थदण्ड कहते हैं और उसके त्याग को अनर्थदण्डविरति व्रत कहते हैं। इस व्रत में इन पांच कारणों से दोष लगता है।

कन्दर्प

राग की अधिकता होने से हास्य के साथ अशिष्ट वचन बोलना।

कौत्कुच्य

हास्य और अशिष्ट वचन के साथ शरीर से भी कुचेष्टा करना।

मौखर्य

धृष्टतापूर्वक बहुत बकवास करना।

असमीक्ष्याधिकरण

बिना विचारे अधिक कार्य करना।

उपभोग

परिभोग अनर्थक्य – अधिक उपभोग – परिभोग सामग्री का संग्रह करना।

 

अनर्थदण्ड पांच प्रकार के है-

पापोपदेश: खोटे व्यापार आदि पाप-क्रिया करने का उपदेश देना। जैसे-मछलीपालन करो, बूचड़खाने खोलो आदि। ऐसी चर्चा करना कि अमुक जंगल में हिरण बहुत अच्छे थे। कसाई ने सुन लिया तो वह वहां गया और सारे हिरणों का शिकार कर दिया।

हिंसादान: हिंसक उपकरणों को देना, व्यापार करना। जैसे-बम, पिस्तौल, फरसा, पटाखा, जेसीबी (मिट्टी खोदने की मशीन), क्रेशर, ब्लास्टिग के उपकरणों का लेना-देना एवं हिंसक पशुओं का पालन करना- जैसे-बिल्ली, कुत्ता, मुर्गा, सर्प आदि।

अपध्यान: परदोषों को ग्रहण करना, दूसरे की लक्ष्मी को चाहना, परस्त्री को चाहना आदि। द्वेष के कारण वह मर जाए, उसकी दुकान नष्ट हो जाए, उसकी खेती जल जाए, वह चुनाव में हार जाए, उसके यहां डाका पड़ जाए आदि।

प्रमादचर्या : बिना प्रयोजन के जमीन खोदना, जल फेंकना, अग्नि जलाना, हवा करना, वनस्पति तोड़ना, घूमना, घुमाना आदि।

दुःश्रुति: चित्त को कलुषित करने वाला अश्लील साहित्य पढ़ना, सुनना, गीत सुनना, नाटक,टेलीविजन एवं सिनेमा आदि देखना दु:श्रुति नामक अनर्थदण्ड है।

 

दृष्टव्य है कि महावीर ने पृथ्वी पर पदविहार करके प्राणिमात्र को अभयदान दिया था। आज कोरोना के संक्रमणकाल में मनुष्य की सांसों पर जो संकट आया है, उसका कारण मनुष्य स्वयं ही है। ऐसी परिस्थितियां हर काल में कम या अधिक बनती रही हैं। पृथ्वी का दोहन हमने इस तरह से किया है कि उसके लिए सांस लेने की भी जगह नहीं बची है। रोग-प्रतिरोधक कम होने से आज समूचा जगत भय के साये में रहने और जीने को विवश हो गया है। कोरोना ने सबको क्वारंटाइन कर दिया है। क्वारंटाइन का अर्थ है अकेले में रहना। महावीर मानते हैं कि अकेलेपन में कोई होता ही नहीं है। कमरे में बंद हो जाने का मतलब अकेले रहना नहीं है। अकेलेपन में विषाद के लिए कोई जगह नहीं होती है। अकेलेपन में तो भीतर के पाप की कुरुपता उभरकर बाहर आ जाती है। देखा जाए तो क्ववारंटाइन के दौरान मनुष्य का मन हर तरह की उधेड़बुन में लगा रहता है तो फिर अकेलापन कहां रहा। कोरोना काल ने साबित कर दिया है कि हमें स्वास्थ्य देखभाल के ढांचे को फिर से पारिभाषित करना चाहिए ताकि भोजन को दवा के रूप में देखा जाए। यह एक ऐसी बीमारी है जो रोकी जा सकती है और उपचारयोग्य है। और यह मार्ग भगवान महावीर हमें पहले ही दिखा गए हैं।

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