सबसे मैत्री का भाव रखो

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sabse maitri ka bhaav rakho

भीलूडा – अंतुर्मखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज ने बुधवार को भीलूडा के श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित सभा में कहा कि हमारे आचार्योे ने कहा है कि आप चाहते हो कि जीवन में ज्ञानार्जन हो, विकास की ओर बढे, अहिंसा का भाव जागृत हो, सफलता मिले, दया और करूणा का भाव हो तो सबसे मैत्री भाव रखो। बिना मैत्री भाव के हम सुख से नहीं रह सकते है।

मुनिश्री ने कहा कि हमारा जीवन द्वंद्व, कषायों में पडा रहता है। हम सदैव दूसरों के अवगुणों को देखते है, लेकिन जब सबके लिए मैत्री भाव होगा तो हम दूसरों के अवगुणों को नहीं देखेंगे। यह जीवन इतना कठिन है, इसे सरल बनाने के लिए मैत्री भाव रखना जरूरी है। शत्रुता के साथ जीवन जी नहीं सकते हैं। शत्रुता के साथ जीवन ही नहीं मरण भी दु:खदायी हो जाता है। मुनिश्री ने कहा कि हम किसी को अपना शत्रु बना लेते हैं, उसका कुछ हो ना हो, लेकिन आपके मन में कषाय आ जाता है और आपकी स्थिति बिगड जाती है। वहीं जिसे मित्र मान रखा है तो उसे देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों की संगति रखना जो आपको सकारात्मक दृष्टि दे और अच्छे विचार अपनाने के लिए प्रेरित करे। तीर्थंकर भगवान सारे जीवों के प्रति दया और करूणा का भाव होता है, तभी वे तीर्थंकर बनते हैं। जिस दिन तीर्थंकर का जन्म होता है तो उस दिन नारकीय जीवों को भी सुख का अनुभव होता है। आपके साथ कोई कैसा भी व्यवहार करे, लेकिन आप उसके साथ मैत्री का व्यवहार रखो। मैत्री में भेदभाव भी मत रखो। आपके अंदर मैत्री का भाव जागृत होगा तो पुण्य का भाव आएगा। दूसरों का बुरा सोचेगे तो पहले बुरा आपका होगा, क्योंकि मन तो पहले आपका खराब होगा। आपके भाव कैसे हैं, यह आपको ही देखना होगा। इस संसार में सच्ची मैत्री धर्म से ही हो सकती है। आपके अंदर यदि कषाय या शत्रुता का भाव आ रहा है तो इसका अर्थ है कि आपकी संगति सही नहीं है। यदि संगति सही होती तो यह भाव नहीं आते। गलत संगति से आप सबके शत्रु बन जाते है। जो निंदा करता है, उसे अपने साथ रखो, ताकि आपको अपनी गलतियों का पता चलता रहे। धर्म यही काम करता है। इसलिए धर्म से मैत्री रखो।

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