कहानी:- ‘जिंदगी में प्राथमिकता निश्चित करें’- अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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एक बार फिलोसॉफी की कक्षा में एक प्रोफेसर प्रवेश करते हैं। उनके साथ में एक कांच का जार, कुछ पत्थर, कंकड़ और कुछ बालू भी थी। प्रोफेसर के प्रवेश करते ही सभी ने अभिवादन किया। प्रोफेसर ने बताया की आज कक्षा में और दिनों की अपेक्षा कुछ खास सीखने को मिलेगा। विद्यार्थी खुश एवं उत्साहित थे कि आज कुछ खास सीखने को मिलेगा। प्रोफेसर ने अब खाली जार में पत्थरों को भरना शुरू किया जब तक कि जार भर नहीं गया। जार भरने पर प्रोफेसर ने विद्यार्थियों से पूछा “क्या जार भर गया”? सभी ने हां में उत्तर दिया। अब प्रोफेसर ने कंकडों को जार में डालना शुरू किया साथ ही साथ जार को हिलाया भी, जिससे पत्थरों के बीच मे कंकड़ अपना रास्ता आसानी से बना पायें। जब जार भर गया तो दोबारा प्रोफेसर ने विद्यार्थियों से पूछा “क्या अब जार पूरा भर गया?” इस पर दोबारा विधार्थियों ने हां में जवाब दिया। अब प्रोफेसर ने उसमे बालू के कण डालने आरम्भ किये, बालू के कण अपना रास्ता बनाते हुए उस जार में प्रवेश कर गये। प्रोफेसर के दोबारा पूछने पर विद्यार्थियों ने कहा, अब जार पूर्ण रूप से भर गया है। ऐसा सुनकर प्रोफेसर ने पानी लेकर उस जार में उड़ेल दिया, वह भी उसमें समा गया। प्रोफेसर ने विद्यार्थियों को समझाते हुए बताया कि आपको अपने जीवन में प्राथमिकता को निश्चित करना होगा। जिंदगी भी एक कांच के जार की तरह है जिसमें सबसे जरूरी पत्थर है क्योंकि पत्थर से अभिप्राय आपका परिवार, चरित्र और स्वास्थ्य है जबकि कंकड़ आपकी नौकरी एवं अन्य आवश्यकता है तथा बालू हमारे जीवन की छोटी-छोटी जरूरतों का प्रतिनिधित्व करती है इसलिए यदि हम अपने जीवन रूपी जार में पहले बालू भर देंगे तो बाकी चीजों के लिए जगह नहीं बचेगी इसलिए आपके जीवन में जो सबसे ज्यादा जरूरी है, उसे ज्यादा महत्व और समय दें।
सीख – जीवन की जरूरतों की प्राथमिकता को समझें। समय बचने पर बाकी चीजों को महत्व दें।

अनंत सागर
कहानी
(चौतीसवां भाग)
20 दिसम्बर, 2020, रविवार, बांसवाड़ा
अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

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