वन में भी सेवा-सत्कार – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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सीता को वन से कौन लेकर गया? इसका वर्णन पद्मपुराण पर्व 99 में मिलता है। आइए, पढ़ें और जानें कि सीता वन से कहां गईं?

सीता को वन में दुःखी देखकर पुण्डरीक नगर के राजा द्विरदवाह की सुबन्धु रानी का पुत्र वज्रजंघ सीता से कहता है- तुम धर्मविधि से मेरी बड़ी बहन हो तो उठो और चलो मेरे साथ। शोक करने से क्या होगा? तब सीताडी वज्रजंघ से कहती हैं- तू मेरा भाई है, अत्यंत शुभ है, यशस्वी है, बुद्धिमान है, धैर्यशाली है। एक दूसरे के प्रति इस प्रकार वचन कहकर वज्रजंघ ने सीता के लिए पालकी मंगवाई और उसमें सीता को बैठाकर पुण्डरीक नगर की और चल दिया। वज्रजंघ के आदेश से नगरी को, तिराहों,चौराहों, मार्गों और महलों को सजाया गया। जगह- जगह तोरण लगाए गए, द्वारों पर जल से भरे कलश रखे गए। जगह- जगह ध्वजाएं और माला लगाई गईं। पूरा नगर उत्साहित था सीता के स्वागत के लिए। वज्रजंघ के घर के पास में ही अत्यन्त सुंदर महल में सीता ने प्रवेश किया। महल में अनेक स्त्रियां सीता की सेवा के लिए तैयार थीं। सीता भी वहां सबके साथ धर्मकथा और राम की चर्चा करती थीं। वज्रजंघ को राजाओं से जो जो भेंट मिलती थी, वह सब सीता को दे देता था। सीताजी उसीसे धर्मकार्य करती थीं।

अनंत सागर
पाठशाला
26 जून 2021, शनिवार
भीलूड़ा (राज.)

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