पाठशाला : विद्या और साधना के प्रति समर्पित था रावण – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज

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बच्चों तुम्हें पता है कि पद्मपुराण में रावण के जीवन को बताने वाले ऐसे प्रसंग आते हैं जो विद्या और साधना के प्रति उसकी लगन को बताते हैं। इन्हीं में से प्रसंग को पढ़ते हैं-

रावण अपने भाइयों के साथ भीम वन में तपस्या का संकल्प लेकर पहुंच गया। वहां जाकर विद्या अध्ययन और शक्ति अर्जन करने लगा। वन में सबसे पहले रावण ने एक लाख जापकर सर्वकामन्नद विद्या सिद्ध की जो मनचाहे अन्न प्राप्त करवाती थी। इसके बाद रावण जब सोलह अक्षर वाली विद्या सिद्ध कर रहा था तब जम्बूद्वीप के अधिपति अनावृत यक्ष और उसकी पत्नियों ने विघ्न डालना प्रारंभ कर दिया। रावण को विचलित करने के लिए यक्ष ने पहाड, सर्प, हाथी, अग्नि, समुद्र आदि का रुप धरा पर रावण जस का तस साधनारत रहा। उसने अपनी विद्या के बल से रावण के दोनों भाइयों के सिर काटकर रावण के सामने रख दिए, इस पर भी जब वह अड़िग रहा तो उसने रावण की बहन चन्द्रनखा का धर्म भ्रष्ट करने और माता-पिता व भाइयों को पीड़ा पहुँचाने का स्वांग रचा, पर रावण साधना में लीन रहा। रावण के मन में यह दृढ़ विश्वास था कि ईश्वर भक्ति में रत साधकों के साथ कुछ बुरा हो ही नहीं सकता। यक्ष के सभी प्रयास विफल रहे और रावण को सभी विद्याएँ सिद्ध हो गई। इसके बाद यक्ष ने भी प्रसन्न हो रावण को कई वरदान दिए।

इस प्रकार रावण ने संचरिणी, कामदायिनी, कामगामिनी, दुर्निवारा, जगत्कम्पा, प्रज्ञप्ति, भानुमालिनी, अणिमा, लघिमा, क्षोभ्या, मन:स्तम्भनकारिणी, संवाहिनी, सुरध्वंसी, कौमारी, वधकारिणी, सुविधाना, तपोरुपा, दहनी, विपुलोदरी, शुभप्रदा, रजोरुपा, दिनरात्रिविधायिनी, वज्रोदरी, समाकृष्टि, अदर्शनी, अजरा, अनलस्तम्भिनी, तोयस्तम्भिनी, गिरिदाराणी, अवलोकिनी, अरिध्वंसी, घोरा, धीर, भुजंगिनी, वारुणी, भुवना, अवध्या, दारुणा, मदनशिनी, भास्करी, भयसंभूति, ऐशानी, विजया, जया, बन्धनी, मोचनी, वाराही, कुटिलाकृति, चित्तोद्भवकारी, शांति, कौबेरी, वशकारिणी, योगेश्वरी, बलोत्सादी, चण्डा, भीति और प्रवर्षिणी आदि 18 हजार महाविद्याओं और सिद्धियों को प्राप्त किया।

अनंत सागर
पाठशाला
सैतालीसवां भाग
20 मार्च 2021, शनिवार, भीलूड़ा (राजस्थान)

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