ममता की एक अनूठी कथा :- अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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श्रवण कुमार एक पौराणिक पात्र हैं जिन्हें आज भी मातृ-पितृभक्ति के लिए जाना जाता हैं। इतिहास में मातृभक्ति और पितृभक्ति के लिए श्रवण कुमार का नाम अमर हैं। हिन्दू धर्म ग्रंथ रामायण में श्रवण कुमार का उल्लेख है। श्रवण अपने माता-पिता से अतुलनीय प्रेम करते थे। इनके माता-पिता नेत्रहीन थे इसलिए वो उनकी अत्यंत श्रद्धापूर्वक सेवा करते थे। श्रवण की मां ने उन्हें बहुत कष्ट उठाकर पाला था। उनके माता-पिता का नाम ज्ञानवंती और शांतनु था। कई वर्षों तक जब उन दोनों को कोई संतान नहीं थी। एक दिन ऋषि शांतनु और उनकी पत्नी घर के आंगन में बैठे थे तभी ब्रह्मऋषि नारद जी प्रकट हुए। दोनों पति-पत्नी ने नारद जी की खूब आवभगत की और सेवा सुश्रुषा की उनकी सेवा से प्रसन्न होकर नारद जी ने ज्ञानवंती को आशीर्वाद दिए सौभाग्यवती भव:, आयुष्मति भव:, पुत्रवती भव:। यह आशीर्वाद पाकर ज्ञानवंती ने पूछा की है ऋषि क्या तुम्हारा तीसरा आशीर्वाद भी सफल होगा? इस पर नारद जी ने कहा कि है ज्ञानवती ऋषि के कहे हुए शब्द कभी मिथ्या नहीं होते लेकिन मेरी एक शर्त है तुम्हें पुत्र प्राप्त करने के लिए दोनों को नैमिषारण्य वन में कई वर्ष तक ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या करनी पड़ेगी। तब ऋषि और उनकी पत्नी है नारद जी के बताए अनुसार नैमिषारण्य वन में जाकर ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें दर्शन दिए और वर मांगने को कहा । शांतनु बोले, हे प्रभु! मुझे पुत्रवान होने का वर दो। तब ब्रह्मा जी ने उन्हे कहा, कि पुत्र अवश्य प्राप्त होगा लेकिन मेरी एक शर्त है कि तुम्हारे घर में पुत्र होने पर तुम दोनों की नेत्र ज्योति चली जाएगी। इस पर शांतनु ने कहा कि हे प्रभु क्या हुआ कि यदि मेरी नेत्र ज्योति चली जाएगी, मैं पुत्रवान तो कहलाऊंगा, मुझे आपकी सभी शर्तें मंजूर हैं। इस पर ब्रह्माजी ने कहा कि मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि तुम्हें पुत्र प्राप्ति होगी और यह भी आशीर्वाद देता हूं कि तुम्हारे इस पुत्र का नाम संसार में युगों-युगों तक याद किया जाएगा। बाद में शांतनु के पुत्र होने पर दोनों माता-पिता की नेत्र ज्योति चली गई और वो अंधे हो गए। उस बालक का नाम श्रवण कुमार रखा गया। बचपन से ही माता-पिता का काम करने में वो जरा भी थकते नहीं थे बल्कि उन्हें आनंद मिलता था। माता-पिता उन्हें हमेशा आशीर्वाद देते रहते थे। श्रवण कुमार के समझदार होने पर एक बार उनके अंधे माता-पिता ने इच्छा जताई की उनके बेटे ने उनकी सभी इच्छाएं पूरी की है बस एक इच्छा बाकी रह गई है। उन्होंने तीर्थयात्रा करने की इच्छा जताई। श्रवण कुमार ने माता-पिता की आज्ञा मानते हुए उन्हें प्राण रहते उनकी इच्छा पूरी करने का वचन दे दिया। कंधे पर कांवर लेकर और उसमें दोनों को बैठाकर वह तीर्थयात्रा करने निकल पड़े। यह कथा ममत्व का एक उत्कृष्ट उदाहरण है ।

अनंत सागर

कहानी
(
दूसरी)

10 मई 2020, उदयपुर

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