स्वाध्याय – 19 : आहार दान ऐसे करना चाहिए

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नवपुण्यैः प्रतिपत्तिः सप्तगुण समाहितेन शुद्धेन ।
अपसूनारम्भाणा मार्याणामिषयते दानम् ।। 113।। (रत्नकरण श्रावकाचार)

पाँचसूनरूप पापकार्यों से रहित आर्य (धार्मिक) पुरुषों को नौ पुण्यों के (नवधा भक्ति) साथ, शुद्ध सप्त गुण से संयुक्त श्रावक के द्वारा जो आहारादि देने के रूप में आदर-सत्कार किया जाता है, वह दान कहा जाता है ।
पंचसूना : ओखली, चक्की, चौका-चूल्हा, जलघटी (पानी भरना), बुहारी
नवद्या भक्ति : पड़गाहन, ऊंचे आसान, पाद प्रक्षालन, अष्ट द्रव्य से पूजा, प्रणाम (नमोस्तु), मन शुद्धि, वचन शुद्धि, काय शुद्धि, आहार (भोजन) शुद्धि ।
दाता के सात गुण : श्रद्धा, संतोष, भक्ति, विज्ञान, अलुब्धता, क्षमा, सत्य ।
अन्य ग्रन्थ में यह भी आए हैं। (श्रद्धा, शक्ति, अलुब्धता, भक्ति, ज्ञान, दया, क्षमा

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