ऐ मानव…मेरे सदगुणों को देखो और पहचानो – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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एक अर्थ में रावण का जीवन प्रेरणा देने वाला भी है। यहां मैंने कभी उस दृष्टि के साथ पढ़ा और समझा ही नहीं। केवल, उसे नकारात्मक दृष्टि से ही देखा है। उसके जीवन को सकारात्मक दृष्टि से देखेंगे, तो बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। आज अपने जीवन के एक प्रसंग को रावण स्वयं अपने जुबानी बता रहा है…आप पढ़ें। इसे पढ़ने के बाद आप को कर्म के प्रभाव से भावों का पता चल जाएगा कि वे कैसे बदलते हैं।
मैंने सीता का हरण तो किया, पर उनके साथ एक मर्यादा से आगे सीमा का उल्लंघन नहीं किया। क्योंकि, वह मुझे नहीं चाहती थी। वह मेरे महल में थी, तब भी मैंने जबरन उस पर अधिकार जमाने की कोशिश नहीं की। मेरी पत्नी पटरानी मंदोदरी ने भी सीता को समझाया था कि तुम रावण को स्वीकार कर लो, पर सीता के मना कर दिया तो मैंने कभी भी बल का प्रयोग नहीं किया। सीता का हारण जरूर किया। वह मेरा अपराध था। मेरी बुराई थी, पर सीता को स्पर्श तक नहीं करने की इच्छा मेरी अच्छाई थी। वह मेरी नेकी थी।
एक बात बताऊं, जब मैं सीता का हरण कर उसे विमान से लंका ले जा रहा था, तब सीता राम के वियोग में आर्तनाद करते हुए विलाप कर रही थी। मैं उसके आंसुओं को देख विरक्त हो गया। मैंने उसे अपने से दूर बैठा दिया। मैं सीता से नजर भी नहीं मिला पा रहा था। मैं उसे वहीं छोड़ना चाहता था, पर विधि का विधान था और मेरे मन का विचार कि इसे धन, वैभव, शक्ति, धार्मिक क्रिया, खाने-पीने के व्यंजन और अन्य प्रभावों से परिचित करवाकर इसका मन परिवर्तित करुंगा। अपना बना लूंगा। यह केवल मेरा विचार था। मैं एक पतिव्रता स्त्री की भावनाओं को समझ नहीं पाया कि सीता जैसी नारी इन तुच्छ वस्तुओं के छलावे में नहीं आती। पर मैंने अपना संयम नहीं खोया।
बताओ, आज के जमाने में कोई है जो सारे साधन और शक्ति होने के बावजूद स्त्री के मोह में संयम रखे! अरे आज तो लोग अपने रूतबे और धन का इस्तेमाल स्त्री की मर्यादा को तार-तार करने में लगा देते हैं। उसे रावण वृत्ति कहते हैं? नहीं, मैं रावण संयमी था। यह मेरी वृत्ति नहीं। मैं सीता के लिए व्याकुल हुआ, जो मेरे पाप कर्म का उदय था, क्योंकि इसके बाद मेरा सबकुछ चला गया।
परस्त्री की भावना मात्र ने मुझसे शक्ति, धन, ज्ञान, विनय और अपने भाई, बेटा, पिता, मंत्री, पत्नी, बहन, मित्र को दूर कर दिया। सीता का हरण करने के बाद ही मैं अहंकारी हुआ। गुरु का अविनय करने लगा। मेरे भाई विभीषण ने मेरा त्याग कर दिया। मैं युद्ध में मारा गया। कोई कहता है- राम ने मारा। कोई कहता है- लक्ष्मण ने। राम तो दलायु थे। वे शत्रु से प्रेम करते थे और फिर जिनका भाई लक्ष्मण हो उसे युद्ध की क्या आवश्यकता।
लक्ष्मण नारायण थे और मैं प्रतिनारायण. हमारे बीच युद्ध होना ही था। मेरा अंत भी निश्चित था। मेरा संहार तो मेरे कर्मों की गति का परिणाम था। मैं यहां आपके समक्ष वह कह रहा हूं जो मेरे मन की पीड़ा है। ज्ञानी के अज्ञानमयी अंधकार में खोने की वजह है। पर, अपनी कमजोरी और पापकर्म का बोध कर आत्मग्लानी के साथ प्रायश्चित करना आसान नहीं होता, यह तो कोई पुण्यशाली जीव ही कर सकता है। मैं पुण्यशाली हूं, क्योंकि मैं जीवन-मरण से मुक्त होकर मनुष्य से तीर्थंकर होने का अधिकारी बन चुका हूं।
अब आप ही बताओ कि कीचड़ में यदि आपको हीरा नजर आए, तो क्या करोगे। हीरे की संपूर्ण चमक को देखने के लिए निश्चय ही उसपर से कीचड़ हटा दोगे और हीरे को सजाकर रखोंगे, न कि उस कीचड़ का रोना रोओगे? अत: मेरे जीवन के गुणों की चमक ही आपका भला कर सकती है। मेरे जीवन के एक गलत कार्य के कीचड़ को हटाकर मेरे अनन्य सत् गुणों को देखोगे, समझोगे और सिर्फ उन्हें ही धारण करोगे, तो अवश्य ही आपके परिणाम शुद्ध होंगे। न कि मेरे पुतले को जलाकर मुझे कोसने से।

अनंत सागर
कर्म सिद्धांत
(पैतीसवां भाग)
29 दिसम्बर, 2020, मंगलवार, बांसवाड़ा
‘ऐ मानव…मेरे सदगुणों को देखो और पहचानो’
अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

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