अहंकार को धरातल पर रखकर जीना ही मार्दव धर्म है-अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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दूसरा दिन

उत्तम मार्दव धर्म

उल्लासित करने वाले पर्व का आज दूसरा दिन है। इसे मार्दव धर्म कहते हैं। सच्चे शब्दों में इसकी परिभाषा यह है कि स्वयं को छोटा मानकर, सभी से मीठा बोलना, आंखें झुकाकर बात करना। इसमें यह भी ध्यान रखा जाये कि ध्यान डर के कारण, लोभ के कारण, राग के कारण शक्ति नहीं होने के कारण करना मार्दवता नहीं है। सर्वगुण सम्पन्न होने पर जब दूसरों के प्रति उपकार का भाव आता है, वही वास्तव में मार्दवता है। मार्दव धर्म मान-कषाय के अभाव में आता है। रावण जैसा शक्तिशाली, ज्ञानी, धनवान अनेक ऋद्धियों का धारण करने वाला, सुन्दर और उत्तम कुल के साथ ही इतना पुण्यशाली था कि आने वाले समय में वह तीर्थंकर होता पर वह उस भव से अपने अहंकार के कारण नरक गया और लोक में आज भी उसका नाम सुनते ही लोगों के अन्दर उसके प्रति शत्रुता का भाव जागृत हो जाता है, जबकि वर्तमान के लोगों का उसने कुछ नहीं बिगाड़ा पर उसने अहंकार में आकर एक स्त्री का हरण कर लिया, हालांकि उसने उसे स्पर्श तक नहीं किया पर अहंकार के कारण उसके सारे गुण नष्ट हो गए। आज भी हम उसे जलाते हैं। परिवार में उसका नाम तक नहीं रखते हैं। इस धर्म से हमें सीख लेनी चाहिए कि हमारे अन्दर के लोभ, ईर्ष्या, क्रोध, जलनशीलता रूपी रावण को निकालकर प्रेम, स्नेह, सहयोग रूपी राम को जगह दें, तभी मार्दव धर्म हमारे अन्दर प्रवेश कर सकता है।

आज का जाप :

।। ऊँ ह्रीं उत्तम मार्दवधर्मांगाय नम:।।

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