ऐसा होता है जिन मंदिर का स्वरूप – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज

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जहां पर जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमा विराजमान होती है उसे मन्दिर कहते हैं। प्राचीन शास्त्रों में मन्दिर को जिनालय, चैत्यालय के नाम से भी जाना जाता था। सम्यदर्शन की प्राप्ति के बहिरंग कारणों में जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमा का दर्शन मुख्य कारण है। जिनालय समवशरण का प्रतीक है। जिस प्रकार से समवशरण में सभी जीव (मनुष्य, देव, तिर्यंच) वैरभाव को भूलकर एक साथ मैत्रीभाव के साथ तीर्थंकर का उपदेश सुनते है उसी प्रकार सभी विकारों का त्यागकर जिनालय में भगवान के दर्शन करने चाहिए। समवशरण में मानस्तम्भ होता है उसी के प्रतीक स्वरूप जिनालय में भी मानस्तम्भ होता है।

जिनालय में शिखर का निर्माण इसलिए किया जाता है कि मकान और जिनालय में अंतर दिखाई दे। शिखर का आकार पिरामिड के समान होता है जिससे ध्वनि तरंगे एक जगह एकत्रित होती हैं। शिखर के नीचे बैठकर जाप, पाठ आदि करने से मन को शांति मिलती है। मंदिर का शिखर दिखने के साथ ही हमारे भाव शुद्ध होने लगते हैं। तीर्थंकर तीन लोक के स्वामी हैं यह दिखाने के लिए जिनालय में विराजमान प्रतिमा पर तीन छत्र लगाते हैं। समवशरण में साक्षत जिनेन्द्र भगवान पर देव चंवर ढुराते हैं उसी के प्रतीक स्वरूप जिनालय में प्रतिमा के पास चंवर लगाते हैं।

जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमा अष्टप्रातिहार्य सहित होनी चाहिए। वेदी पर अष्टमंगल द्रव्य होना चाहिए।

अनंत सागर
पाठशाला
इकतालीसवां भाग
6 फरवरी 2021, शनिवार, बांसवाड़ा

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