अकेला महसूस कर रहा हूं, मन स्थिर नहीं है

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विचार जो हैं वो पुराने हैं, उसी में शुभ अशुभ का द्वंद है

अपने आप को अकेला महसूस कर रहा हूं। घबहाट भी हो रही है। कभी अकेला नही रहा तो एक अलग ही प्रकार का अनुभव हो रहा है। हमेशा किसी ना किसी के बीच खुद को बातों से, विचारों से और कार्य से मन-वचन से घिरा हुआ पाता हूं। आज दो दिन हो गए 15×15 के कमरे में अपने आप को बैठाए रखा हूं। सोचता क्या हूं और विचार कुछ और ही आ जाते हैं। मन की स्थिरता अभी तक नही बन पाई है। अकेले में रहने की कभी कोशिश नहीं की तो अब मन नही लग रहा है। विचार, चिंतन एक जगह रुक ही नही रहे हैं। हर क्षण बदल रहे हैं। चिंतन का पूरा समय इसी खोज में लग गया है कि कैसे मैं अपने चिंतन को एक जगह, एक काम पर स्थिर करूं। कुछ समय बाद पुरानी स्मृति आई कि जब मैंने कर्म सिद्धांत पढ़ा था, तो उसमें समझा था कि जो सुख और दुःख जीवन में आते हैं वह हर पल विचारों के कारण आते हैं। जिस प्रकार से विचार एक जगह नहीं रहते उसी तरह सुख-दुख नहीं रहते हैं। आज मैं महसूस कर रहा हूं कि वास्तविक धर्म और साधना तो अपने आप पर रुकना है। आज वही किया पर सफलता नहीं मिली। जितनी देर चिन्तन में रहा, एक स्थान पर नही था पर एक खुशी है की जो चिंतन आ रहा था या विचार आ रहे थे वह सब एक अगस्त के पहले के थे। दो दिनों से बाहर क्या चल रहा पता नहीं है। उससे यह फायदा है कि यहां के शुभ-अशुभ कर्मों से बचा हुआ हूं। जो पुराने हैं, उसी में शुभ-अशुभ का द्वंद चल रहा है। नई स्मृतियां तो रुक गई हैं और जो आ रही हैं वह मेरी अकेले की है। जो अच्छी ही होंगी क्योंकि खुद का अनुभव तो सदैव से अच्छा ही होता।

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