संस्कारों ने मोहनदास को बनाया महात्मा – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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मैं जैन नही हूं पर जैन धर्म के सिद्धांतों को मानने वाला और उन पर चलने वाला व्यक्ति हूँ। मैं सत्य में विश्वास रखता हूँ। सत्य को स्वीकार करना और सत्य के रास्ते पर चलना ही वास्तविक अध्यात्म है । मैं अहिंसा से बड़ा धर्म किसी को नही मानता हूं । मैं मानता हूं कि शरीर के चिंतन से मनुष्य के अंदर की मानवता का नाश हो जाता है । मैं मानता हूं कि आत्म चिंतन, मनन करने से कर्म शत्रुओं के नाश के साथ लौकिक जीवन के हर कार्य में सफलता मिलती है । मैं मानता हूँ कि अध्यात्म के चिंतन से दुख में भी सुख का अनुभव होने लगता है । मैं मानता हूं कि परिग्रह से बड़ा कोई बड़ा पाप नही है। परिग्रह का भाव ही हमारी संस्कृति और संस्कारों का नाश करता है । मैं मानता हूं कि जीवन जीने के लिए जितना जरूरी है वह परिग्रह नही ।
ये उद्गार राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी के हैं और उनकी ये सभी मान्यताएं जैन धर्म के मूल ग्रंथो में हैं।
इस प्रकार के विचारों का चिंतन करने और उनको जीवन में उतारने के कारण ही एक साधारण से व्यक्ति मोहनदास करमचंद गांधी सब के लिए महात्मा गांधी बन गए । उनके आचरण ने उन्हें महात्मा बना दिया और पूरा विश्व उन्हें महात्मा गांधी के नाम से जानने लगा । अपने जीवन से उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि जन्म दो प्रकार के होते है- पहला मां के गर्भ से होता है और दूसरा संस्कारों से । संस्कारो से ही उनका नया जन्म हुआ था इसलिए नया नामकरण भी हो गया । महात्मा गांधी की आत्मकथा में एक श्लोक का उद्धरण किया गया है जो महात्मा गांधी के आध्यात्मिक विचार को बताता है ।
ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।
संगात्संजायते कामः, कामात्क्रोधोऽभिजायते।।
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो, बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।
अर्थात्- विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध होने पर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोह से स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होने पर बुद्धि का नाश हो जाता है। बुद्धि का नाश होनेपर मनुष्य का पतन हो जाता है।
‘अकाल-पुरुष गांधी’ में महात्मा के बारे में लिखा है कि ‘गांधी जी ने एक बार कहा था कि मेरा सबकुछ ले लो मैं रहूंगा। हाथ काट लो, आंख और कान ना रहें तब भी रहूंगा। सिर जाए तब भी कुछ पल रह जाऊं, पर ईश्वर गया तब तो मैं उसी दम मरा हुआ ही हूं।’
एक बार एक मारवाड़ी सज्जन गांधीजी से मिलने आए। उन्होंने सिर पर बड़ी-सी पगड़ी बांध रखी थी।
वे गांधीजी से बोले- आपके नाम से तो ‘गांधी टोपी चलती है और आपका सिर नंगा है, ऐसा क्यों?’
इस पर गांधीजी ने हंस कर जवबा दिया, ‘20 आदमियों की टोपी का कपड़ा तो आपने अपने सिर पर पहन रखा है। तब 19 आदमी टोपी कहां से पहनेंगे? उन्हीं 19 में से एक मैं हूं।’

अनंत सागर
अंतर्भाव
(तेईसवां भाग)
2 अक्टूबर, 2020, शुक्रवार, लोहारिया

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