साधना ही ज्ञान का मार्ग है – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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वास्तव में आत्मज्ञानि कौन होता है? इस बात को एक कहानी से समझते हैं। एक गुरु के दो शिष्य थे। एक का नाम विनीत था और एक अविनीत। गुरु ने दोनों को ‘सोऽहम्’ का पाठ पढ़ाया। अविनीत ने साधना तो की नहीं। बाजार में लोगों को कहता फिरता है कि ‘मैं ईश्वर हूँ, ‘मैं ईश्वर हूं’। कुछ विवेकशील लोगों ने कहा- क्यों बकवास करता है? ईश्वर बनना कोई सरल कार्य नहीं। मौन में ही फायदा है।
लेकिन अविनीत कहां मानने वाला था! वह तो अपनी धुन में ही मस्त। बार-बार उसी बात का प्रचार कि- मैं ईश्वर हूं। लोगों ने उसकी मूर्खता का इलाज करने के लिए उसके मुख पर चांटा मारा, हाथ पर अंगारे रखें, वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा- हाय! मेरा हाथ जल गया। हाय! मेरा हाथ जल गया। लोगों ने कहा- मूर्ख! क्यों चिल्लाता है, तू तो ईश्वर है, ईश्वर का हाथ क्या कभी जलता है? ईश्वर को चांटा लगता है?
वहीं विनीत ने साधना प्रारम्भ की। क्या पांच इन्द्रियां सोऽहं हैं? नहीं। गुरु ने कहा- शिष्य! साधना कर। क्या मन सोऽहम् है? नहीं है। क्या बुद्धि सोऽहं है? नहीं है। साधना करते-करते आखिर उसको वास्तविक ज्ञान मिला आत्मा ही सोऽहं है। आत्मा के सिवाय अन्य सब जो बाह्य पदार्थ हैं, वे सब नश्वर है। अस्थिर हैं। आत्मा अजर है, अमर है, अटल है, शाश्वत है। सोऽहं आत्मा है।!
गुरु ने कहा- शिष्य! तेरी विद्या फलित हुई है। तूने विनय से ज्ञानार्जन किया, उसी का शुभ परिणाम सबके सामने है। वह अविनीत था, उसका ज्ञान उसके ही अपमान का हेतु बना, यह सर्वविदित ही है।

अनंत सागर
अंतर्भाव
(बाईसवां भाग)
25 सितम्बर, 2020, शुक्रवार, लोहारिया

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