Antarmukhi LIVE : मनुष्य रोगी हो जाता है उसके रोगी होने का कारण क्या है? हमें निरोगी रहने के लिए क्या करना चाहिए? – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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जिससे कि हम रोगी होते हैं और अब हमें आगे रोगी नहीं होना है तो जो पुरुष न तो किसी रोगी को औषध दान देता हो, कोई रोगी व्यक्ति है जिसकी इलाज कराने की क्षमता नहीं है और हमारे पास बहुत सारा धन है या इतती क्षमता हमारे पास है, इतना अधिकार हमारे पास है या इतनी पहुंच है कि हम गरीब व्यक्तियों को दवाई वितरित कर सकें और फिर भी हम ऐसा ना करें तो हम रोगी हो जाते हैं। इसके लिए हमें यह करना चाहिए कि जो दवाई के लिए लाचार हैं, जिनके पास दवाई के लिए पैसा भी नहीं है जैसे कि कोई बाढ़ पीड़ित हो जाता है या लोग बाढ़ में बह जाते हैं या ऐसे भी जरुरतमंद गरीब व्यक्ति हैं जिनको हम इच्छुक कहते हैं उन तक हम पहुंचे और उनकी बीमारियों को हम दूर करें। कई बीमारियां फैल रही हैं उन बीमारियों का इलाज हम अपने परिचय के माध्यम से करा दें, हमारे पास धन है तो धन के माध्यम से करा दें या उनकी हम खुद सेवा करें। अगर हम सेवा करते हैं तो भी हम आने वाले समय में निरोगी होते हैं और हमारे जीवन में पुण्य का उदय होता है। इससे भी हमारा शरीर निरोगी होता है। हम देखते हैं कि बहुत से लोग अस्पतालों में भर्ती होते हैं और उन लोगों का डॉक्टर इलाज करते हैं। उन की बीमारी पर लाखों रुपया खर्च हो जाता है लेकिन फिर भी वह ठीक नहीं हो पाते हैं तो ऐसे लोगों को साधुओं को औषध दान देना चाहिए। रोगी साधुओं की सेवा करनी चाहिए। अगर साधु हमें नहीं मिल पाये तो हमारे आस-पास कोई व्यक्ति जो रोगी हो और वह अपना इलाज कराने की क्षमता नहीं रखता हो तो उसके लिए हम औषधियां उपलब्ध करवा दें, उसका हम इलाज करवा दें। यह हम धन के माध्यम से भी कर सकते हैं, अपने पद की ताकत से भी कर सकते हैं और अपनी जान-पहचान से भी कर सकते हैं। यह कई रास्ते हैं जिनके माध्यम से हम अपने आपको ऊंचाईयों तक पहुंचा सकते हैं। यह पहला दान हो गया। दूसरा अगर हमारे पास धन नहीं है तो हम रोगियों की सेवा भी कर सकते हैं। हम एक घंटे के लिए अस्पताल जाएं, रोगियों से मिलें, उनसे बातें करें, उनका दिल खुश करें। उनको कोई ऐसा रोग हो गया है जिसके कारण वह उदास रहते हैं तो हमें उनको हिम्मत देनी चाहिए। यह सब करना भी हमारे लिए कार्यकारी होता है। हमारे आचार्यों ने कहा है कि मन से, वचन से, काया से हमें सेवा करनी चाहिए। हमें किसी रोगी की निन्दा भी नहीं करनी चाहिए और किसी रोगी के रोग से घृणा भी नहीं करनी चाहिए क्योंकि इसके कारण भी हमारे जीवन में रोग उत्पन्न हो सकते हैं। अगर इस भव में हम ऐसा करते हैं तो अगले जन्म में हम रोगी होते हैं। दान देना पुण्य कार्य है तथा जो पुरुष समर्थ होकर दान नहीं देता वह पाप कहलाता है। हमारे को डायबिटिज हो गई, हार्ट की बीमारी हो गई या माइग्रेन की बीमरी हो गई तो यह सब रोग किसी ना किसी कारण से होते हैं और यह रोग जड़ से समाप्त हो जाएं इसके लिए सबसे अच्छा इलाज है कि हम रोगियों की सेवा करें, रोगियों को हिम्मत और ताकत दें। अगर आप रोगियों को हिम्मत और ताकत देंगे तो मैं मानता हुं कि जीवन में कभी भी आपके शरीर में रोग उत्पन्न नहीं होंगे। आपको जीवन में कभी भी दवाई लेने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। आपको घर और व्यापार के अलावा बचे हुए समय में रोगियों की सेवा करने का विचार करना चाहिए। संकल्प करना कि आज से मैं 10 मिनिट, पांच मिनिट, आधा घंटे रोगियों की सेवा करुंगा। ऐसा करने से आपको कोई भी रोग हो, वह ठीक हो जाएगा।

1 दिसम्बर 2019, उदयपुर

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