अंतर्भाव : अपने किए का फल तो भोगना ही होता है – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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पद्मपुराण के पर्व 72 में कहा गया है कि जब रावण शत्रु पक्ष से युद्ध के लिए सोच रहा था और विचार कर रहा था कि किसे कैसे मारूंगा तब निमित्तज्ञानी (भविष्य के बारे में जानने वाले) आपस में चर्चा कर रहे थे। यह चर्चा कर्म निर्जरा के लिए आत्मचिंतन करने योग्य है।
देखो यह कैसे उत्पात हो रहे हैं। चारों दिशाओं में किस प्रकार आकुलता दिख रही है। वृक्ष अपने आप गिर रहे हैं। पशु-पक्षी भी डर रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि देवताओं की प्रतिमाओं की आंखों में से अश्रु जल की वर्षा हो रही है। इन सबसे ऐसा लगता है कि यह स्वामी (रावण) के मरण की सूचना दे रहे हों क्योंकि इस प्रकार की घटनाएं, अशुभ क्रियाएं बिना वजह नहीं होती हैं। पुण्यहीन होने पर स्वर्ग का इन्द्र भी मरण को प्राप्त करता है। वास्तव में कर्म से बलवान इस संसार में कोई नहीं है। जो जीवन में होना है उससे दूर नहीं भागा जा सकता है। वह तो होना ही है। अपने किए का फल तो सबको भोगना ही होता है। ऐसे समय में तो देवता भी सहायता नहीं कर सकते हैं।

देखो जो समस्त नीतिशास्त्र का जानकार है, लोकतंत्र को जानने वाला है, जैनधर्म का जानकार है और अनेक गुणों से सहित है और ऐसे गुणों से सहित होता हुआ भी रावण स्वकृत कर्मों के कैसे चक्र में फंस गया है कि दुर्बुद्धि होकर वह अधर्म-कुमार्ग पर चला गया। संसार में मरण से बड़ा कोई डर नहीं पर देखो रावण अहंकार में आकर उसकी भी चिंता नही कर रहा है। यह सब पाप कर्म का फल है कि वह मूर्ख होता हुआ अपने विनाश के कारण भूत युद्ध में जाना चाहता है।

अनंत सागर
अंतर्भाव
उनचासवां भाग
2 अप्रैल 2021, शुक्रवार, भीलूड़ा (राजस्थान)

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