भाग तेरह : अपने से झगड़ने वाले को भी बड़े प्रेम से समझाते थे सातगौड़ा – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantशांति कथा

सातगौड़ा बहुत ही शांत प्रकृति के थे। चाहे खेल हो या अन्य कोई कार्य, वह हमेशा प्रथम रहते थे। वह किसी से झगड़ते नहीं थे, बल्कि अपने से झगड़ने वाले को भी बड़े प्रेम से समझाते थे। वह अपने संगी-साथियों को समझाते थे कि बुरा काम नहीं करना चाहिए। वह नदी में तैरना तक जानते थे। वह शारीरिक रूप से बहुत बलशाली भी थे। वह बहुत सरल थे लेकिन कभी मेलों और तमाशों में नहीं जाते थे। सातगौड़ा केवल धार्मिक उत्सवों में भाग लेते थे। वह सभी से कहते थे कि अपना काम ठीक से करना चाहिए और फालतू की बातों में नहीं पड़ना चाहिए। सातगौड़ा की माता सत्यवती भी बच्चों को कभी चोरी नहीं करने, झूठ न बोलने और अधर्म न करने की शिक्षा देती थीं। मां की इन्हीं शिक्षाओं का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव था। गांव में कोई भी दिगंबर साधू आता तो वह उसकी सेवा तन-मन से करते थे। सातगौड़ा केवल भोजन करने घर आते थे और बाकी समय दुकान में ही रहते थे। वहां भी वह खाली समय में केवल शास्त्र ही पढ़ते रहते थे। सातगौड़ा का भोजन भी बहुत मर्यादित रहता था । वह अभक्ष्य नहीं खाते थे। बचपन से ही उनके हृदय में वैराग्य का भाव छिपा हुआ था।

Related Posts

Menu