छठवां दिन : अप्रेक्षा न रखें तो ही बेहतर – अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantचिंतन, मौन साधना

दुःखों से बचने के लिए अप्रेक्षा नहीं रखनी चाहिए, आज चिंतन में यह विचार आते ही मन खिन्न हो गया। बार- बार मन में आने लगा कि संयम जीवन के 22 सालों में भी अब तक नहीं समझ पाया कि दूसरों से अप्रेक्षा रखना ही मन को मलिन करना है। आज चिंतन में मेरी स्मृति में एक नहीं, अनेक ऐसी बातें आईं जिनसे मैंने अप्रेक्षा रखी, जिन पर अप्रेक्षा रखी जब वह अप्रेक्षा पर खरे नहीं उतरे तो उनके बारे में नकारात्मक सोच आने लगी। मुझे यह सोचकर ही डर लगा कि उस समय  मैंने कितने ही भावों को मलिन कर न जाने कितने पापकर्म का बंध किया होगा। जिसके बारे में सोचा होगा, उनका तो पता नहीं क्या हुआ। पर मेरे उस समय के अशुभ कर्म किस रूप में और कब उदय में आएंगे और मेरे संयमित जीवन को कितना विचलित करेंगे, यह सोचकर ही मैं अंदर ही अंदर कम्पित हो रहा हूं। मेरा चिंतन अब इसी मुझे उधेड़ बुन में लग गया कि आगे क्या होगा। चिंतन से विचलित होने लगा। बार- बार वापस चिंतन की और बढ़ने लगा। तब जाकर इतना ही समझ में आया कि हम जो काम स्वयं कर सकते हैं, उतना ही करना चाहिए। किसी दूसरे के भरोसे रहकर किसी काम का विचार भी नहीं करना चाहिए। इन्ही विचारों में घंटों तक रहा।

पर प्रश्न तो अभी भी यही खड़ा था कि अप्रेक्षा नहीं रखे बिना  जीवन कैसे चलेगा? मन मस्तिष्क में यही उत्तर दौड़ने लगा कि साधु जीवन में कपड़े की आवश्यकता नहीं,न ही घर की और भोजन की। क्योंकि कपड़े मैं पहनता नही हूं, न साधु का कोई घर है, मंदिर ही साधु का घर है और भोजन श्रावक भक्ति से करवाते हैं। फिर, इससे बड़ी अज्ञानता,मुखर्ता क्या होगी कि मैंने बिना प्रयोजन ही उन वस्तुओं की अप्रेक्षा रखी जो साधु के योग्य ही नहीं है। अप्रेक्षा के चक्कर में मैंने न जाने कितने अशुभ कर्म बन्ध किए हैं। यह सोच-सोच कर ही चिंत्तन आगे बढ़ ही नहीं रहा था। इतने मैं चिंतन से बाहर हो गया।

मंगलवार  10 अगस्त 2021, भीलूड़ा

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