कहानी : और वे अरिहंत बन गए – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज

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अयोध्या नगरी के राजा राम दीक्षा लेकर मुनि बन गए। उनकी पत्नी रानी सीता ने पृथ्वीमति मांं से दीक्षा ली थी। तप के प्रभाव से वे अगले जन्म में स्वर्ग में देव बनी थीं। सीता के जीव ने मुनि राम को ध्यान करते देखा और सोचा कि राम ऐसे ही तपस्या करते रहे तो वो मुझसे पहले मोक्ष को प्राप्त हो जाएंगे।

तब सीताजी ने रामजी की तपस्या में व्यवधान लाने का विचार किया, ताकि उन्हें मोक्ष न मिले और वे दोनों स्वर्ग में साथ रह सकेंं। बाद में दोनों साथ में मोक्ष पा लेंगे। सीता वाले देव के पास अद्भुत शक्ति थी। वह मुनि राम के पास सीता का रूप बनाकर गईं और कहने लगी, हे राम! बड़ी मुश्किल से मैंने आपको पाया है, आप मेरा साथ दीजिए।

मगर राम तो अपनी आत्मा में लीन थे, इसलिए उनका ध्यान नहीं टूटा। सीता ने बार-बार उनका ध्यान तोड़ना चाहा, लेकिन रामजी पर कोई असर नहीं हुआ। जब सीता को लगा कि इनका ध्यान तो टूट ही नहीं रहा, तो उन्होंने अपनी शक्ति से सौ से ज्यादा लड़कियों को बुला लिया। वे सभी लड़कियांं संगीत बजाने लगींं, फिर भी रामजी तो सिर्फ अपनी साधना में मगन थे। वे बिना किसी भटकाव के बस ध्यान में लगे रहे। फिर मुनि राम की आत्मा शुद्ध होने लगी और वे अरिहंत बन गए। भगवान बन गए। इस दुनिया में सबसे उत्तम, सबसे खास बन गए, सबके आराध्य बन गए। इसीलिए रामजी की भारत में सभी लोग पूजा करते हैं।

अनंत सागर
कहानी
अड़तालीसवां भाग
28 मार्च 2021, रविवार, भीलूड़ा (राजस्थान)

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