भाग बारह : बच्चों के प्रति वात्सल्य का भाव रखते थे सातगौड़ा – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantशांति कथा

सातगौड़ा बहुत ही दयालु थे। उनकी करुणा हर जीव के प्रति थी। लोग उन्हें दयासागर, अहिंसावीर भी कहते थे। जहां भी पशुओं की बलि दी जाती, वहां पहुंचकर वह ऐसा उपदेश देते थे कि लोग जानवरों की बलि देना ही बंद कर देते थे। सातगौड़ा तो सर्प जैसे जानवरों से भी प्रेम करते थे, उनसे तनिक भी नहीं डरते थे। उनका मानना था कि संसार में कोई भी प्राणी बिना सताए कष्ट नहीं देता। उनका धैर्य इस कदर असाधारण था कि माता-पिता का समाधिमरण होने पर उनके भावों में वैराग्य की वृद्धि ही दिखाई दी थी। सातगौड़ा की आत्मा बालक के समान पवित्र थी। इसी वजह से वह बच्चों के प्रति वात्सल्य का भाव रखते थे । सातगौड़ा में न तो किसी भी तरह का व्यसन था और न ही किसी तरह की चंचलता थी । वह जिस बात की परीक्षा करते थे, वह सदा ठीक निकलती थी। तंबाकू की फसल आने पर उसका पैड़ा बांधने में उनकी कुशलता की सभी सराहना करते थे। वह तंबाकू को सुवास संपन्न बनाने के लिए लंवग लगाने का विशेष प्रयोग करते थे, जिसकी सब तारीफ किया करते थे। सातगौड़ा ने कभी किसी की नकल नहीं की, बल्कि सभी उनका अनुसरण ही करते थे।

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