महिला दिवस विशेष: बेटियों के बचने से ही समृद्ध होगी संंस्कृति -अंतर्मुखी मुनि श्री 108 पूज्य सागर महाराज

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भारतीय संस्कृति और जैन संस्कृति में प्रारंभ से ही बेटियों का महत्व रहा है। हम इस युग के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की बात करें तो उन्होंने सौ पुत्र होते हुए भी अपनी दो पुत्रियों ब्राह्मी और सुंदरी को क्रमश: अक्षर और अंकगणित का ज्ञान दिया। यह बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि कि भगवान आदिनाथ बेटियों को कितना महत्व दिया करते थे। सामान्य जीवन में भी हमें शक्ति अर्जन के लिए दुर्गा की आराधना करनी होती है, ज्ञान के लिए हम देवी सरस्वती के पास जाते हैं तो धन का आकांक्षा हम मां लक्ष्मी से करते हैं। यह सार्वभौमिक सत्य है कि जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए इन तीनों की आवश्यकता होती है। ऐसे में हमें हर हाल में शक्ति की आराधना करनी ही होती है। तो सोचें कि जब धर्म और प्राचीन इतिहास में बेटियों को इतना महत्व दिया गया है तो हम क्यों वर्तमान में बेटियों को गर्भ में ही हत्या जैसा कुकृत्य कर रहे हैं। अगर ममता की पुजारी ही ममता का ही गला घोंट रही है। कहीं न कहीं इसका कारण सामाजिक और पारिवारिक कुरीतियों में छिपा हुआ है, जिन्हें निभाने की मजबूरी के चलते भी मां अपनी ममता को त्याग देती है। याद रखें ये बेटियां ही हैं जो हमारे हर मानवीय कार्य में काम आती हैं। अगर भ्रूण हत्याएं इसी प्रकार चलती रहीं तो हमारे परिवार और समाज के मांगलिक कार्य ही समाप्त होते जाएं। ऐसे में आवश्यकता है कि हम परिवार और समाज के रूप में एकजुट होकर सरकार द्वारा चलाए जा रहे ‘बेटी बचाओ अभियान’ में एक आहूति देकर अपने कर्तव्यों को पूरा करें। बेटी बचाएं, बेटी पढ़ाएं। उसे एक सशक्त नागरिक बनाएं, ताकि हमारा राष्ट्र भी उन्नति के नए शिखर को छू सके।

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