भक्तामर स्तोत्र काव्य – 15

label_importantभक्तामर स्तोत्र

भक्तामर स्तोत्र

काव्य – 15

राजसम्मान-सौभाग्यवर्धक

चित्रं कि -मत्र यदि ते त्रिदशाङ्ग नाभिर्-
नीतं मना गपि मनो न विकार-मार्गम् ।
कल्पान्त -काल-मरुता चलिता चलेन
किं मन्दराद्रि-शिखरं चलितं कदाचित् ॥15॥

अन्वयार्थ – यदि – यदि । त्रिदशाङ्गनाभि – देवांगनाओं के द्वरा । ते – आपका । मनः – मन । मनाक्- जरा सा । अपि – भी । विकारमार्गम् – विकार भाव को । न नीतम् – नहीं प्राप्त हुआ । अन्य – तो इसमें । किम् – क्या । चित्रम् – आश्चर्य है ? । चलिताचलेन- पर्वतों को चलायमान करने वाले । कल्पान्तकाल – प्रलय काल के । मरुता – पवन से । किम् – क्या । मन्दराद्रिशिखरम् – सुमेरु का शिखर । कदाचित् – कभी । चलितम् – चलायमान हुआ है ? ।

अर्थ- यदि आपका मन देवांगनाओं के द्वार किचित भी विकृति को प्राप्त नहीं कराया जा सका,तो इस विषय में आश्चर्य ही क्या है ? पर्वतों को हिला देने वाली प्रलयकाल की पवन के द्वरा क्या कभी मेरू पर्वत का शिखर हिल सका है ? नहीं ।

मंत्र जाप – ऊँ नमो भगवती गुणवती सुसीमा पृथ्वी व्रज – श्रुखला मानसी महामानसी स्वाहा ।
ऊँ नमो अचिंत्य बल पराक्रमाय सर्वार्थकाम रुपाय ह्रां ह्रीं क्रौं श्रीं नम: स्वाहा

ऋद्धि मंत्र – ऊँ ह्रीं अर्हं णमो दस पुव्वीणं झ्रौं झ्रौं नमः स्वाहाः ।

अर्घ्य – ऊँ ह्रीं मेरुवन्मनोबलकरणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

दीप मंत्र –ऊँ ह्रीं मेरु वत्मनोबल करणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभनाथ जिनेन्द्राय दीपं समर्पयामि स्वाहा ।

जाप विधि – लाल कपडे,मूंगा की माला ,लाल आसन पर बैठकर 14 दिन तक प्रतिदिन काव्य, ऋद्धि मंत्र और मंत्र की जाप दशांग धूप के साथ करना चाहिए । एकाशन के साथ करना है ।

कहानी

सबसे ज्यादा मूल्यवान

दिगंबर मुनियों का ब्रह्मचर्य व्रत कोई नहीं तोड़ सकता। वह हिमालय के समान अटल होता है। उनकी शक्ति अपार होती है। एक बार एक युवा माता-पिता के साथ हर रोज मंदिर जाता और उपदेश सुनता। युवक की शादी हो गई। शादी की प्रथम रात दुल्हन अपने दूल्हे की प्रतीक्षा करने लगी। दूल्हा आया लेकिन देखा कि उसकी आंखों में आंसू थे। दूल्हे ने कहा कि वह मुनिराज से माह के शुक्ल पक्ष तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने का नियम ले चुका है। तभी दुल्हन ने कहा कि मैंने भी एक आर्यिका से कृष्ण पक्ष में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने का नियम लिया है। तब दोनों ने फैसला लिया कि दोनों भाई-बहन की तरह रहेंगे और जिस दिन उनके माता-पिता को पता चल जाएगा, उस दिन वे मुनि और आर्यिका बन जाएंगे। एक दिन एक श्रावक ने एक हजार अस्सी मुनियों को आहार कराने तक भोजन न करने का संकल्प लिया। उसे इतने मुनि नहीं मिले। एक दिन एक विद्वान मुनि नगर में पधारे। श्रावक से मुनि ने कहा कि एक नगर में बाल ब्रह्मचारी पति-पत्नी रहते हैं। उन्हें आहार दो तो अस्सी हजार मुनियों के बराबर आहार हो जाएगा। श्रावक उनके घर पहुंचा और उनके माता-पिता को उनके बारे में बताया। यह पता चलते ही पति-पत्नी मुनि और आर्यिका बन गए क्योंकि उन्हें ब्रह्मचर्य का आनंद मिल चुका था, जिसके आगे सारे भोग-विलास फीके थे।

शिक्षा : इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि कुछ चीजें ऐसी हैं, जिनका केवल अनुभव किया जा सकता है, वही चीजें इस संसार में सबसे ज्यादा मूल्यवान हैं, जिनमें से एक ब्रह्मचर्य व्रत है।

चित्र विवरण- सामान्य पर्वतों को हिला देने वाली प्रलय काल की प्रचण्ड वायु सुमेरु को हिलाने में असमर्थ है । हास विलासों से परिपूर्ण अप्सराओं के मोहक नृत्य के सम्मुख भी आदिनाथ प्रभु सुमेरू की तरह अकम्प विराजमान है ।

Related Posts

Menu