भक्तामर स्तोत्र काव्य – 17

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भक्तामर स्तोत्र

काव्य – 17

सर्व उदर पीडा नाशक

नास्तं कदाचि – दुपयासि न राहु-गम्यः,
स्पष्टी-करोषि सहसा युगपज् जगन्ति ।
नाम्भो धरोदर-निरुद्ध-महा-प्रभावः,
सूर्याति शायि-महिमाऽसि मुनीन्द्र ! लोके ॥17॥

अन्वयार्थ- मुनिन्द्र – हे मुनीश्वर । कदाचित् – तुम कभी भी । अस्तं – अस्त । न उपयासि – नहीं होते हो । न राहुगम्य – न राहु के गम्य हो । सहसा – सहज ही । जगन्ति – तीनों लोकों को । युगपत् – एक साथ । स्पष्टीकरोषि – प्रकाशित करते हो । अम्भोधरोधर – मेघों के द्वारा आपका । निरुद्ध महाप्रभावः – महाप्रभाव निरुद्ध । न (अतः) – नहीं होता है इसलिए । लोके – लोक । सूर्यातिशायि – सूर्य से भी अतिशय युक्त्त । महिमा – महिमा वाले । असि- हो ।

अर्थ – हे मुनीन्द्र ! आप न तो कभी अस्त होते , न ही राहु के द्वारा ग्रसे जाते हैं और न आपका महान तेज मेघ से तिरोहित होता है आप एक साथ तीनों लोकों को शीघ्र ही प्रकाशित कर देते हैं अत: आप सूर्य से भी अधिक से अधिक महिमावंत हैं।

मंत्र जाप – ऊँ ह्रीं णमिऊण अट्ठे मट्ठे क्षुद्र विघट्ठे क्षुद्र पीडां भंजय भंजय सर्वपीडां सर्व रोग निवारणं कुरु कुरु नम: / स्वाहा ।
ऊँ नमो अजित शत्रु पराजयं कुरु कुरु स्वाहा ।

ऋद्धि – ऊँ ह्रीं णमो अट्ठां महानिमित्त कुसलाणं झ्रौं झ्रौं नमः स्वाहा

अर्घ्य- ऊँ ह्रीं पापान्धकार निवारणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

दीपं मंत्र – ऊँ ह्रीं पापान्धकार निवारणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभनाथ जिनेन्द्राय दीपं समर्पयामि स्वाहा

जाप विधि – सफेद कपडे, सफेद माला,सफेद आसन पर बैठकर सात दिन तक प्रतिदिन 1000 बार काव्य, ऋद्धि मंत्र और मंत्र का जाप चन्दन की धूप के साथ करना चाहिए । पूर्व दिशा की और मुख कर कर के जाप करना चाहिए ।

कहानी 17

जिनभक्त बना पाखंडी

भक्तामर स्त्रोत के अध्ययन से पापी और पथभ्रष्ट व्यक्ति को भी सद्बुद्धि प्राप्त होती है। यह कथा कुछ ऐसा ही बताती है। रत्नशेखर नाम का एक व्यक्ति कुसंगति में पड़ गया। वह एक ढोंगी योगी के संपर्क में आ गया, जो स्त्रियों का शोषण करता था। योगी उनसे उनका तन, मन, धन सब कुछ ले लेता था। रत्नशेखर अपने गुरु से आगे निकल गया और कुकर्मों में लिप्त हो गया। बेटे को गलत रास्ते पर देख उसके माता-पिता ने उसका विवाह कर दिया। उसकी पत्नी कल्याणीश्री बेहद गुणवान थी। वह हर रोज भक्तामर का पाठ करती थी। उसने अपने पति को सुधारने का बीड़ा उठाया। रत्नशेखर भी बुराई छोडऩे लगा लेकिन जब उसके ढोंगी गुरु को यह बात पता चली तो उसने फिर से रत्नशेखर को अपने बस में करने की कोशिश की। कल्याणी ने यह देखकर उस योगी को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया। भोजन के बाद पेयजल को उसने भक्तामर स्त्रोत के 17वें श्लोक से अभिमंत्रित कर दिया। योगी भोजन समाप्त कर ही रहा था कि जिनशासन की देवी गांधारी उसके सामने प्रकट हो गई और उसे एक स्वर्ण अंगूठी देकर उड़ाने को कहा। अगूंठी नहीं उड़ी। अब गांधारी ने अंगूठी आकाश में फेंकी तो आकाश में विशाल जिनालय दिखाई दिया। यह देखकर योगी देवी के चरणों में गिर पड़ा। अपने गुरु की यह स्थिति देख रत्नशेखर भी लज्जित हुआ और जिनभक्त बनकर सुख-शांति से अपना जीवन जीने लगा।

शिक्षा : इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि भक्तामर के 17वें श्लोक का पाठ पूरी भक्ति से करने से बड़े से बड़ा पाखंडी भी जिनभक्त बन जाता है।

चित्र विवरण- चित्र में सूर्य को राहू के द्वरा ग्रसित दिखाया है,लेकिन पुरुदेव आदिनाथ रुप सूर्य को ग्रसने में समर्थ कोई राहु नहीं हैं ।

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