भक्तामर स्तोत्र काव्य – 19

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भक्तामर स्तोत्र

काव्य – 19

जादू-टोना-प्रभाव नाशक

किं शर्वरीषु शशि नान्हि विवस्वता वा ?
युष्मन्-मुखेन्दु दलितेषु तमस्सुनाथ ।
निष्पन्न-शालि-वन-शालिनी जीव-लोके,
कार्यं कियज्-जलधरैर्-जलभार नम्रै: ॥19॥

अन्वयार्थ – नाथ -हे स्वामिन् । तस: सु – समस्त अन्धकार में । युष्मन्यखेन्दु – आपके मुखचन्द्र द्वारा । दलितेषु – नष्ट कर दिये जाने पर । शर्वरीषु – रात्रि में । शशिना – चन्द्रमा से । किम् – क्या प्रयोजन है । वा – और । अन्हि – दिन में । विवस्वता – सूर्य से । किम् – क्या प्रयोजन । जीव लोके – संसार में । निष्पन्नशालिवनशालिनी – धान के खेतों में पक जाने पर । जलभारम्रै: – जल से भरे हुए । जलधरै: – मेघों से । किम् – क्या प्रयोजन है ? कुछ भी नहीं ।

अर्थ – हे स्वामिन ! जब अंधकार आपके मुख रूपी चन्द्रमा के द्वारा नष्ट हो जाता है तो रात्रि में चन्द्रमा से एवं दिन में सूर्य से क्या प्रयोजन ? पके हुए धान्य के खेतों से शोभायमान धरती तल पर पानी के भार से झुके हुए मेघों से फिर क्या प्रयोजन ।

मंत्र जाप – ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रूँ ह्र: य क्ष ह्रीं वषट् नम: स्वाहा ।

ऋद्धि जाप- ऊँ ह्रीं अर्हं णमो विज्जा हाराणं झ्रौं झ्रौं नमः स्वाहा

अर्घ्यं – ऊँ ह्रीं सकल कालुष्य दोष निवारणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वृषभ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

दीप मंत्र – ऊँ ह्रीं सकल कालुष्य दोष निवारणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वृषभ जिनेन्द्राय दीपं समर्पयामि स्वाहा ।

जाप विधि – प्रतिदिन पीले वस्त्र,पीली माला,पीला आसन पर बैठकर मन को एकाग्र करके पूर्व दिक्षा की मुखकर काव्य, ऋद्धि मंत्र और मंत्र का एक सौ आठ जाप करना चाहिए ।

कहानी

सत्य की जीत

भक्तामर स्त्रोत में यह बात अच्छी साबित होती है कि हमेशा सच की जीत होती है, चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों। एक बार एक नगर के राजा ने सुखानंद कुमार नाम के व्यक्ति को छह माह की सजा सुना दी। नगर के सभी लोग हैरान थे क्योंकि सुखानंद बहुत ईमानदार था। दरअसल हुआ यह था कि नगर के प्रमुख स्वर्णकार ने नकली आभूषण बनाकर राजा सूरपाल को दे दिए और पकड़े जाने पर सारा इलजाम जौहरी सुखानंद पर डाल दिया। सुखानंद कुमार ने जेल में तीन महीने तक अन्न-जल भी ग्रहण न किया। भक्तामर स्त्रोत पर उसकी अगाध श्रद्धा थी तो उसने भक्तामर स्त्रोत के 19वें श्लोक का पाठ ऋद्धि मंत्र के साथ करना शुरू किया। एक दिन जेल की कोठरी में जिनशासन की देवी जम्बूमति आई और उसे सोते हुए उठा कर लेकर चली गईं और उसके घर ले जाकर रख दिया। अगले दिन राजा ने देखा कि जेल का दरवाजा खुला हुआ है और सुखानंद अपनी दुकान पर है। यही स्वप्न राजा ने रात को भी देखा था। इसके बाद राजा सूरपाल जैनधर्म का श्रद्धालु बन गया और स्वर्णकार को जेल में डाल दिया।

शिक्षा : इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि भक्तामर के 19वें श्लोक का पाठ पूरी भक्ति से करने से सत्य हर हाल में उजागर होता है और असत्य व्यक्ति को सजा मिलती है।

चित्र विवरण –पके हुए धान्य खेतों के लिये बिजली से परिपूर्ण जलधर अनुपयुक्त प्रतीत हो रहे हैं । तीन लोक के अंधकार को दूर करने वाले देवाधिदेव ऋषभदेव के मुखमण्डल के समक्ष सूर्यचन्द्र भी तुच्छा हैं ।

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