भक्तामर स्तोत्र काव्य – 28

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भक्तामर स्तोत्र

काव्य – 28

सर्व कार्य सिद्धि दायक

उच्चै- रशोक-तरु-संश्रित-मुन्मयूख-
माभाति रूप-ममलं भवतो नितांतम् ।
स्पष्टोल् लसत्-किरण – मस्त-तमोवितानम्,
बिम्बं रवे – रिव पयोधर-पार्श्व- वर्ति ॥28॥

अन्वयार्थ : उच्चै: – ऊचे । अशोकतरु- अशोक वृक्ष के नीचे । संश्रितम् – विराजमान । उन्मयूखम् – जिसकी किरणें ऊपर की ओर जा रहीं हैं ऎसा । भवत: – आपका । नितांतम् – अत्यंत । अमलम् – निर्मल । रुपम् – स्वरुप । स्पष्ट – स्पष्ट रुप से । उल्लसत् – चमकती हुई । किरणम् – किरणों वाले तथा । अस्त तमोवितानम् – अन्धकार के विस्तार को नाश करने वाले । पयोधर – मेघ के । पार्श्ववर्ति – समीपवर्ती । रवे: बिम्बम् – सूर्य के बिम्ब के । इव- समान । आभाति – शोभायमान हो रहा है ।

अर्थ- ऊँचे अशोक वृक्ष के नीचे स्थित,उन्नत किरणों वाला,आपका उज्जवल रुप जो स्पष्ट रुप से शोभायमान किरणों से युक्त है,अन्धकार समूह के नाशक,मेघों के निकट स्थित सूर्य बिम्ब की तरह अत्यंत शोभित होता है।
जाप – ऊँ नमो भगवते जये विजये, जृम्भय, जृम्भय, मोहय मोहय, सर्वसिद्धि सम्पत्ति-सौख्यं कुरू कुरू स्वाहा।

ऋद्धि मंत्र – ऊँ ह्रीं अर्हं णमो महातवाणं झ्रौं झ्रौं नमः स्वाहा ।

अर्घ्य – ऊँ ह्रीं अशोक तरु विराजमान क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

दीप मंत्र – ऊँ ह्रीं अशोक तरु विराजमान क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय दीपं समर्पयामि स्वाहा ।

जाप विधि – सफेद कपडॆ ,सफेद माला,सफेद आसन पर बैठकर उत्तर या पूर्व दिक्षा की और मुख कर जाप करना चाहिए ।

कहानी

टूट गया दंभ

एक बार एक नगर में राजा पृथ्वीपाल का राज था। उनकी एक अति सुंदर कन्या रूपकुंडली था। उसे अपने रूप पर बहुत घमंड था और वह अपनी सहेलियों तक का मजाक उड़ाती थी। एक दिन वह बगिया में अपनी दासियों के साथ अठखेलियां कर रही थी। तभी वहां से एक दिगबंर मुनि गुजरे। रूपकुंडली के इशारे पर पहले तो दासियों ने मुनि को छेड़ा। मुनि ने अपने पर उपसर्ग समझ कर कुछ न कहा। इसके बाद रूपकुंडली की हिम्मत बढ़ गई। उसने मुनि को खूब सताया और उनके शरीर पर तरह-तरह के चित्र तक बना दिए। मुनि ने उसे कुछ न कहा और अपने मार्ग पर चल दिए। उधर जैसे ही रूपकुंडली महल पहुंची, उसके शरीर पर कोढ़ उभर आया। सब उससे दूर भागने लगे। वह समझ गई कि उसे अपने पाप का फल मिला है। वह तुरंत भागी-भागी वन में गई और उन्हीं मुनिराज को ढूंढने लगी। एक जगह मुनिराज तपस्या करते मिले। रूपकुंडली ने अपने कृत्य की माफी मांगी और उनसे कोढ़ दूर करने को कहा। तब मुनि श्री ने उसे भक्तामर स्तोत्र के 28वें श्लोक का पाठ पूरी श्रद्धा के साथ करने को कहा। रूपकुंडली ने ऐसा ही किया और उसका कोढ़ दूर हो गया। राजा यह देखकर बहुत खुश हुआ और उसने जैन धर्म की प्रभावना के लिए एक मंदिर बनवाया।

शिक्षा : इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि भक्तामर के 28वें श्लोक का पाठ करने से कोढ़ जैसा रोग भी दूर हो जाता है और सुंदर शरीर की प्राप्ति होती है।

चित्र विवरण- चित्र में मेघों के निकट स्थित अत्यंत प्रभावशाली सूर्यमण्डल ही तरह भगवान का अत्यंत प्रकाशित हो रहा है ।

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