भक्तामर स्तोत्र काव्य – 30

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भक्तामर स्तोत्र

काव्य – 30

शत्रु स्तम्भक

कुन्दाव- दात-चल-चामर-चारु-शोभं,
विभ्राजते तव वपुः कलधौत-कांतम् ।
उद्यच् छशाङ्क -शुचि-निर्झर-वारि-धार-
मुच्चैस्तटं सुरगिरे – रिव शात-कौम्भम् ॥30॥

अन्वयार्थ : कुन्दावदात – कुन्द पुष्प के समान निर्मल श्वेत । चल-चामर – चलते हुए चंवरों की । चारु शोभम् – सुन्दर शोभा से युक्त । कलधौत- सुवर्ण के समान । कांतम् – कांतिवाला । तव – आपका । वपु: – शरीर । उद्यच् छशाङ्क – उदय होते हुए चन्द्रमा के समान । शुचि निर्झर – निर्मल झरनों की । वारिधारम् – जल धारा से युक्त । सुरगिरे: – सुमेरु पर्वत के । शातकौम्भम् – सुवर्णमयी । उच्चैस्तटम् – ऊचे तट के । इव – समान । विभ्राजते – सुशोभित हो रहा है ।

अर्थ- कुन्द के पुष्प के समान धवल चँवरों के द्वारा सुन्दर है शोभा जिसकी,ऎसा आपका स्वर्ण के समान सुन्दर शरीर,सुमेरुपर्वत ,जिस पर चन्द्रमा के समान उज्ज्वल झरने के जल की धारा वह रही है, के स्वर्ण निर्मित ऊँचे तट की तरह शोभयमान हो रहा है ।

जाप – ऊँ ह्रीं श्रीं श्री पार्श्वनाथ ह्रीं धरणेन्द्र पद्मावती सहिताय नम: स्वाहा ।

ऊँ नमो अट्ठे मट्ठे क्षुद्रान स्तम्भय स्तम्भय रक्षां कुरु कुरु नम: स्वाहा ।

ऋद्धि मंत्र – ऊँ ह्रीं णमो घोर-गुणाणं झ्रौं झ्रौं नम: स्वाहा ।

अर्घ्य – ऊँ ह्रीं चतु: षष्टि चामर प्रातिहार्य युक्ताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

दीप मंत्र – ऊँ ह्रीं चतु: षष्टि चामर प्रातिहार्य युक्ताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय दीपं समर्पयामि स्वाहा ।

जाप विधि – सफेद कपडॆ ,सफेद माला,सफेद आसन पर बैठकर पूर्व दिक्षा की और मुख कर जाप करना चाहिए ।

कहानी

रंक बन गया राजा

एक बार एक किसान था, उसका नाम गोपाल था। उसकी तीन कन्याएं थीं। गांव में सूखा पडऩे से उसकी फसल चौपट हो गई। उस पर कर्ज बढ़ता ही जा रहा था। वह महल में ग्वाले का काम करने लगा लेकिन आमदनी कम होने से उसका गुजारा न होता था। उसने हर मंदिर में माथा टेका, कई मनौतियां मनाई लेकिन कुछ न हुआ। एक दिन वह अपने शुभकर्मों के उदय की वजह से मुनिराज धर्मकीर्ति के संपर्क में आया। मुनि श्री ने उससे भक्तामर के 30वें श्लोक का पाठ पूरे विधि-विधान से करने को कहा। अगले दिन जब गोपाल गाएं चराने जंगल में गया तो एक साफ शिला पर बैठ कर भक्तामर का पाठ करने लगा लेकिन वह बीच-बीच में यह भी देखता कि कहीं कोई देवी तो नहीं आई। कभी देखता कि पशु कहीं दूर तो नहीं चले गए। उसे कोई फल प्राप्त होता नहीं दिखाई देता। वह रोज ऐसा ही करता। एक दिन नगर के राजा की मृत्यु हो गई। सारे सरदार राजा बनने के लिए लडऩे लगे, तब मंत्री ने कहा कि उनके पास एक हाथी है, वह हाथी जिसे माला पहना देगा, वही राजा होगा। सारे लोग हाथी के पीछे भागने लगे। तभी गोपाल जंगल से पशु चराकर आ रहा था और अचानक हाथी उसके पीछे भागने लगा। गोपाल ने भक्तामर के 30वें श्लोक का पाठ करना शुरू कर दिया और तेजी से भागने लगा। हाथी भी तेजी से उसके पीछे भागा। गोपाल ने मंत्र पढऩा जारी रखा और थककर एक जगह बैठ गया। उसने डरके मारे आंखें बंद कर लीं। तभी उसे अपने गरदन पर कुछ महसूस हुआ। यह हाथी की सूंड थी, हाथी ने उसे माला पहना दी थी। गरीब गोपाल राजा बन गया और वह मन ही मन भगवान आदिनाथ के चरणों में झुक गया।

शिक्षा : इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि भक्तामर के 30वें श्लोक का पाठ करने से रंक भी राजा बन जाता है और उसके सारे दुख-दर्द दूर हो जाते हैं।

चित्र विवरण – स्वर्ण निर्मित सुमेरु पर्वत से बहती हुई उज्ज्वल दुग्धवत्,जलधार के समान ही,पंक्तिबद्ध देवों के द्वारा ढुराये जाने वाले चौंसठ चँवर भगवान पर शोभित हो रहे हैं ।

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