भक्तामर स्तोत्र काव्य – 33

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भक्तामर स्तोत्र

काव्य – 33

सर्व ज्वर नाशक

मन्दार-सुन्दर-नमेरु-सुपारिजात
संतानकादि-कुसुमोत्कर-वृष्टि रुद्धा ।
गन्धोद-बिन्दु-शुभ-मन्द-मरुत्प्रपाता,
दिव्या दिवः पतति ते वचसां ततिर्- वा॥33॥

अन्वयार्थ : गन्धोदबिन्दु – सुगन्धित जल बिन्दुओं से युक्त । शुभ मन्द – शुभ मन्द मन्द । मरुत्प्रपाता – वायु के साथ गिरती हुई । उद्धा – ऊर्ध्वमुखी । दिव्या – दिव्य । मन्दार – मन्दार जाति के । सुन्दर – सुन्दर जाति के । नमेरु – नमेरु जाति के । सुपारिजात – पारिजात जाति के । सन्तानकादि – और सन्तानक आदि जाति के । कुसुमोत्कर वृष्टिः – कल्पवृक्षों के पुष्पों की वर्षा । ते –आपके । वचसां – वचनों की । ततिः वा – पंक्ति के समान । दिवः – आकाश से । पतति -हो रही हैं ।

अर्थ- सुगन्धित जल बिन्दुओं और मन्द सुगन्धित वालु के साथ गिरने वाले श्रेष्ठ मनोहर मन्दार,सुन्दर,नमेरु,पारिजात,संतानक आदि कल्पवृक्षों के पुष्पों की वर्षा आपके वचनों की पंक्तियों की तरह आकाश से होती है ।

जाप – ऊँ ह्रां श्रीं क्लीं ब्लूं ध्यान-सिद्धिं परम-योगीश्वराय नमो नमः स्वाहा।

ऋद्धि मंत्र – ऊँ ह्रीं अमोसहि पत्ताणं झ्रौं झ्रौं नमः स्वाहा ।

अर्घ्य – ऊँ ह्रीं समस्त जाति पुष्प वृष्टि प्रातिहार्याय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

दीप मंत्र – ऊँ ह्रीं समस्त जाति पुष्प वृष्टि प्रातिहार्याय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय दीपं समर्पयामि स्वाहा ।

जाप विधि – सफेद कपडॆ ,सफेद माला,सफेद आसन पर बैठकर पूर्व दिक्षा की और मुख कर जाप करना चाहिए ।

कहानी

मन की निर्मलता

जो भक्तामर का पाठ पूरी श्रद्धा से करता है तो कोई उसका ध्यान भंग नहीं कर सकता। ऐसा ही एक राजा के मंत्री के साथ हुआ था। राजा रत्नशेखर अपनी पत्नी के साथ सरोवर में स्नान के लिए उतरे। रानी ने अपने गले का हार खोलकर सरोवर के किनारे रख दिया। तभी एक बंदर आया और उस हार को लेकर भाग गया और जंगल में ले जाकर तपस्या कर रहे एक वीतरागी मुनि के गले में डाल दिया। उधर रानी का हार ने मिलने पर राजा ने अपने मंत्री को हार खोज लाने का आदेश दिया। राजा का मंत्री सुमंत बहुत ही विवेकी था और जैन धर्म का पालन करता था। मंत्री सैनिकों सहित जंगल में हार ढूंढने गया। उसने सैनिकों को जंगल में आगे बढऩे का आदेश दिया और खुद वहीं भक्तामर के 33वें श्लोक का पाठ करने लगा। तभी एक सैनिक ने देखा कि हार मुनिराज के गले में है। सैनिक तुरंत उल्टे पांव लौटा और मंत्री के पास आकर बैठ गया। ऐसे करके सारे सैनिक वापस आ गए। भक्तामर के 33वें श्लोक जाप पूरा होने पर मंत्री ने सोचा कि आखिर इन्होंने ऐसा क्या देख लिया है। मंत्री आगे गया तो मुनिराज के गले में हार था। मंत्री ने चुपचाप हार निकाल लिया। मुनिराज को न तो हार गले में पडऩे का भान था और न ही उसके बाहर निकलने का। मंत्री हार लेकर राजा के पास पहुंचा और सारा किस्सा सुनाया। राजा भी जैन धर्म का अनुयायी बन गया।

शिक्षा : इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि भक्तामर के 33वें श्लोक का पाठ करने से सारे भाव शुद्ध हो जाते हैं और निर्मलता, पवित्रता आ जाती है।

चित्र विवरण- आकाश से देवगण अनेक प्रकार के सुगन्धित पुष्पों की वृष्टि कर रहे है जो भगवान के श्री मुख से निकलने वाले वचनों की पंक्तियों की तरह प्रतीत हो रही है ।

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