भक्तामर स्तोत्र काव्य – 34

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भक्तामर स्तोत्र

काव्य – 34

गर्व रक्षक

शुम्भत् प्रभा-वलय-भूरि-विभा विभोस्ते,
लोक-त्रये द्युति मतां द्युति -माक्षिपंती ।
प्रोद्यद् दिवाकर्-निरंतर-भूरि-संख्या,
दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोम-सौम्याम् ॥34॥

अन्वयार्थ : लोकत्रय – तीनों लोकों में । द्युतिमतां – सभी कान्तिवाले पदार्थों की । द्युतिम् – कान्ति को । आक्षिपन्ती – तिरस्कार करती हुई । ते विभोः –आपके । शुम्भत् – प्रकाशमान । प्रभावलय – भामण्डल की । भूरिविभा – भारी प्रभा । प्रोद्यद्दिवाकर – उदित होते हुए सूर्यों की । निरन्तर – निरन्तर । भूरि संख्या – भारी संख्या वाली । दीप्त्या अपि – दीप्ति (कान्ति) से भी । सोम सौम्याम् – चन्द्र से शोभायमान । निशाम् अपि – रात्रि को भी । जयति – जीत रही है ।

अर्थ- हे प्रभो ! तीनों लोकों के कांतिमान पदार्थों की प्रभा को तिरस्कृत करती हुई आपके मनोहर भामण्डल की विशाल कांति एक साथ उगते हुए अनेक सूर्यों की कांति से युक्त होकर भी चन्द्रमा से शोभित रात्री को भी जीत रही है ।
जाप – ऊँ नमो ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं ह्रौं पद्मावती देव्यै नमो नम: । ऊँ प च य म हृां हृीं नमः।

ऋद्धि मंत्र – ऊँ ह्रीं अर्हं णमो खेल्लो सहि पत्ताणं झ्रौं झ्रौं नमः स्वाहा ।

अर्घ्य – ऊँ ह्रीं कोटी भास्कर प्रभामण्डित- भामण्डल प्रातिहार्याय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

दीप मंत्र – ऊँ ह्रीं कोटी भास्कर प्रभामण्डित- भामण्डल प्रातिहार्याय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय दीपं समर्पयामि स्वाहा ।

जाप विधि – सफेद कपडॆ ,सफदे माला,सफेद आसन पर बैठकर पूर्व या उत्तर नैऋत्य दिक्षा की और मुख कर जाप करना चाहिए ।

कहानी

अपना अपना धर्म

एक नगर में एक राजा भीमसेन राज्य करता था। वह धर्ममार्गी था लेकिन उसे अपने राजा होने का अहंकार भी था। सभी राजा की इस कमजोरी को जानते थे और उसकी चापलूसी करते थे। एक दिन एक चापलूस ने उससे कहा कि वह तो इतना महान राजा है कि उसे एक नए धर्म की स्थापना करनी चाहिए। राजा को यह प्रस्ताव पसंद आया और उसने सारे धर्मों के संकलन से एक नए धर्म की स्थापना कर उसका देवालय बनवा दिया। राज्य में सभी लोगों को इसी धर्म का पालन करने की आज्ञा दे दी गई। इससे राज्य के लोग परेशान हो गए। कुछ तो राज्य छोडक़र चले गए। राजा अपने धर्म को अच्छा बताने के लिए सभी धर्मों की घोर निंदा करने लगा। आखिरकार उसके अशुभ कर्मों की वजह से उसे कुष्ठ रोग हो गया। महारानी उसे देखकर डरने लगी। सभी ने उसकी आज्ञा का पालन बंद कर दिया। तभी एक दिन नगर में जैन मुनि बुद्धकीर्ति पधारे। राजा उनके चरणों में आ गिरा। जैन मुनि श्री ने उसे सबसे पहले कहा सभी धर्मों की बुराई बंद करने को कहा और फिर भक्तामर स्तोत्र के 34वें श्लोक का पाठ पूरे विधि-विधान से करने को कहा। राजा की भक्ति से खुश होकर जिन शासन की देवी चक्रेश्वरी प्रकट हुईं और उन्होंने राजा का कुष्ठ रोग दूर कर दिया। सभी ने राजा का फिर से स्वागत किया।

शिक्षा : इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि भक्तामर के 34वें श्लोक का पाठ करने से सभी धर्मों की निंदा का भाव चला जाता है और उपसर्ग दूर होते हैं।

चित्र विवरण- चित्र में भगवान के भामण्ड की दिव्य कांति एक साथ उदित हुए अनेक सूर्य आदि नक्षत्रों की कांति को भी तिरस्कृत कर रही है ।

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