अमर दानवीर की अमिट गाथा- अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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आज एक ऐसे प्रेरणादायी व्यक्तित्व की कहानी जिनके त्याग, समर्पण की गाथाएं आज भी गूंजती है, जिन्होंने अपना राज्य और उसका सम्मान बचाने के लिए अपनी स्वयं की कमाई और पैतृक सम्पत्ति महाराणा प्रताप को समर्पित कर दी…जी हां…. हम बात कर रहे हैं भारतीय इतिहास में मेवाड़ उद्धारक के नाम से पहचाने जाने वाले दानवीर भामाशाह की। उनका जन्म 29 अप्रैल 1547 को मेवाड़ राज्य के सादड़ी (वर्तमान में पाली जिला) में ओसवाल जैन परिवार में हुआ था। भामाशाह के पिता का नाम भारमल था। वे रणथंभौर के किलेदार थे। भामाशाह के वंशज कावडिंया परिवार आज भी उदयपुर (राजस्थान) में रहते हैं।
भामाशाह का निस्वार्थ सहयोग महाराणा प्रताप के लिए महत्वपूर्व और निर्णायक साबित हुआ। मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सब कुछ न्यौंछावर करने वाले महाराणा प्रताप जब हल्दी घाटी के युद्ध (1576 ई. ) में पराजित हो गए तब उनके पास कुछ नही बचा था। वे अपने परिवार के साथ जंगल- जंगल भटक रहे थे। उस समय दानवीर भामाशाह ने अपनी और पूर्वजों की संपत्ति महाराण प्रताप को इसलिए दे दी ताकि वे मेवाड़ राज्य और यहां की जनता को मुगलों के आक्रमण से बचा सकें। उस समय वह संपति इतनी थी कि 12 वर्ष तक 25000 हजार सैनिकों का निर्वाह आसानी से हो सकता था। इसी धन के बल पर महाराणा प्रताप ने नई सेना तैयार की और मेवाड़ के आत्मसम्मान के लिए मुगलों से युद्ध किया। इन युद्धों में भामाशाह और उनके भाई ताराचन्द्र ने भी भाग लिया। इनके सहयोग से 1586 ई.तक चितौड़ और माण्डलगढ़ को छोड़कर सम्पूर्ण मेवाड़ पर राजा का पुनः अधिकार हो गया। भामाशाह अपनी दानवीरता के कारण इतिहास में अमर हो गए। उदयपुर में राजाओं के समाधि स्थल के मध्य भामाशाह की समाधि बनी हुर्ह है।
भामाशाह के नाम पर 31 दिसम्बर 2000 को 3 रुपय का डाक टिकट जारी किया गया। राजस्थान सरकार हर वर्ष शिक्षा के क्षेत्र में दान करने वालों को भामाशाह सम्मान से सम्मानित करती है। छत्तीसगढ़ शासन ने उनकी स्मृति में दानशीलता, सौहार्द्र एवं अनुकरणीय सहायता के लिए दानवीर भामाशाह सम्मान स्थापित किया। महाराण मेवाड़ फाउंडेशन की तरह से दानवीर भामाशाह पुरस्कार राजस्थान में मेरिट में आने वाले छात्रों को दिया जाता है। भामाशाह के जीवन इतिहास पर सुप्रसिद्ध उपान्यसकर कवि हरिलाल उपाध्याय ने देशगौरव भामाशाह नाम ऐतहासिक उपान्यास लिखा। भामाशाह और उनके भाई ताराचन्द ने आबू पर्वत में जैन मंदिर बनाया।

अनंत सागर
प्रेरणा
(चौबीसवां भाग)
15 अक्टूबर, गुरुवार 2020, लोहारिया
अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

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