भाग ग्यारह : भोजग्राम के लिए पिता तुल्य थे सातगौड़ा – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantशांति कथा

सातगौड़ा घोड़े की परीक्षा करने में बहुत होशियार थे। घोड़े के शरीर में स्थित चिह्नों को देखकर ही वह घोड़े के गुण और अवगुण बता देते थे । बैल परीक्षा में भी उनका कोई सानी (मुकाबला) न था। तंबाकू, धान्य, इक्षु आदि की खेती करने में भी वह विशेषज्ञ थे । कृषि कार्य का उन्हें बहुत अनुभव था। भोज ग्राम और आस-पास के गांव के लोग भी उनसे खेती के बारे में चर्चा करने आते थे, उन्होंने सब का उपकार किया । जब सातगौड़ा की दीक्षा हुई तो सभी लोगों की आंखों में आंसू थे क्योंकि सातगौड़ा भोजग्राम के लिए पिता तुल्य थे । एक बार की बात है, सातगौड़ा मामा के यहां अपने भाइयों के साथ गए । उसी समय मामा के यहां नारियल के वृक्ष में लगे नारियल को छेदने की बात चली, सातगौड़ा ने उस समय अपनी एकाग्रता का परिचय दिया । जिस सतागौड़ा ने कभी अपने जीवन में बंदूक नहीं चलाई थी, उस सातगौड़ा ने उस दिन बंदूक हाथ में ली और नारियल पर निशाना लगाया। क्षण भर में नारियल पेड़ से गिर कर नीचे आ गया। इसके बाद उन्होंने कभी बंदूक को हाथ नहीं लगाया। इससे बात तो यह स्पष्ट है कि सातगौड़ा में एकाग्रता का कौशल बचपन से ही था। इस प्रकार से हर कार्य में उनका स्थान प्रथम रहता था। सातगौड़ा का मन इतना निर्मल रहने का कारण था कि उन्होंने कभी दूसरों की निंदा नहीं की, न ही किसी के गुणों को देख ईर्ष्या की और न ही कभी उनके मुख से किसी के लिए कठोर शब्द निकले।

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