पुत्र हो तो चामुंडराय जैसा- अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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गंगराज के नरेश राचमल्ल (राजमल्ल) की राजधानी तलवनपुर के महामंत्री और सेनाध्यक्ष चामुंडराय गुरुभक्ति, मातृत्व भक्ति और धर्म अनुष्ठान की प्रेरणा देने के लिए इतिहास के पन्नों में सैदव स्मरणीय रहेंगे। उन्होंने अपनी माँ कालादेवी की इच्छा पूरी करने के लिए एक असंभव कार्य को पूरा करने का संकल्प किया था।
चामुंडराय को पता चला की उनकी मां कालादेवी ने नियम लिया है कि जब तक पोदनपुर के बाहुबली के दर्शन नही करूँगी तब तक दूध नही पीऊँगी। चामुंडराय जानते थे कि दर्शन होना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। मां कालादेवी के प्रति प्रेम और गुरु आचार्य श्री आजिसेन की श्रद्धा ने उनका मार्गदर्शन किया। मां के प्रति इतनी आस्था का होना ही अपने आप में एक वीरता है। लक्ष्य था तो लक्ष्य पूरा होने का विश्वास भी था। कुछ न कुछ रास्ता जरूर निकलेगा, यही दृढ़ भरोसा था। विश्वास था कि मां का संकल्प पूरा होगा, कैसे होगा, यह नहीं पता था। पर यह विश्वास था कि होगा अवश्य।
चामुंडराय यात्रा करते-करते कटप्रव (चंद्रगिरि पर्वत) पहुंच गए। वहीं पर उन्हें आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती के दर्शन हुए। चामुंडराय ने उन्हें मां के संकल्प के बारे बताया और ये भी कहा कि उन्होंने पोदनपुर में बाहुबली के दर्शन नहीं होने तक दूध नहीं पीने का नियम ले लिया है। उन्होंने गुरुदेव से मार्गदर्शन मांगा। आचार्य श्री ने भरोसा दिलाया कि मां का उद्देश्य अच्छा है इसलिए कोई ना कोई रास्ता जरूर निकलेगा। एक रात चामुंडराय को स्वप्न आया। सपने में नेमिनाथ भगवान की यक्षिणी कुष्मांडिनी देवी ने दर्शन दिए और कहा कि, “पोदनपुर के बाहुबली के दर्शन होना इस पंचम काल में संभव नहीं है। हां, तुम्हारी भक्ति के चलते सामने वाली पहाड़ी पर बाहुबली के दर्शन होंगे। तुम कल सुबह दक्षिणमुख खड़े होकर एक बाण चलाना, वह बाण जहां लगेगा, वहीं पर बाहुबली की प्रतिमा का निर्माण होगा।” अगली सुबह चामुंडराय ने भगवान की पूजा करने के बाद स्वप्न की बात मां को बताई। मां ने चामुंडराय को बताया कि यह सपना उन्हें भी आया है। चामुंडराय अपनी मां के साथ आचार्य श्री के पास पहुंचे तो उनके चेहरे पर मुस्कान थी। आचार्य श्री को जब सपने की बात बताई तो वो बोले कि ऐसा सपना उन्हें भी आया है। चामुंडराय ने उनसे इस सपने का फल पूछा। आचार्य बोले, “तुम्हें कुष्मांडिनी देवी का स्वप्न इसलिए आया है क्योंकि तुम्हारी मां भगवान नेमिनाथ की प्रतिदिन पूजा अर्चना करती हैं। इस वक्त यात्रा में भी भगवान नेमिनाथ की प्रतिमा उनके साथ है। तुम कल से ही इस सपने में बताया गया काम शुरू करो। मां को यहीं बाहुबली भगवान के दर्शन होंगे। प्रातःकाल पूजा-पाठ कर आचार्य श्री की आज्ञा और आशीर्वाद लेकर चामुंडराय ने बाण चलाया तो पहाड़ी (विंध्यगिरि) की एक विशाल चट्टान पर बाहुबली का रेखाचित्र दिखाई दिया। श्रवणबेलगोला स्थित इस पहाड़ी विंध्यगिरि पर इस दृश्य को देखने गंगराज वंश के सम्राट राचमल्ल (राजमल्ल )परिवार सहित श्रवणबेलगोला पहुंचे। वहां पर बाहुबली के रेखाचित्र को देखकर उन्होंने अद्वितीय प्रतिमा बनाने का आदेश दिया। उन्होंने ये भी कहा कि, “चाहे जितना भी धन खर्च हो, उसकी चिंता छोड़ मूर्ति निर्माण के कार्य में जुट जाओ। सारा राजकोष चामुंडराय के लिए खुला है”।
आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती का आशीर्वाद लेकर चामुंडराय मूर्ति निर्माण के लिए शिल्पी की तलाश में निकल गए। उन्हें एक शिल्पी मिला। चामुंडराय ने खुद की पहचान शिल्पी से छिपाए रखी। वह उसे लेकर मंदिर निर्माण वाली जगह पहुंचे। मूर्ति निर्माण के बदले में पारिश्रमिक की बात होने लगी। शिल्पी ने मांग रखी कि मूर्ति खोदते समय पत्थर का जितना चूरा बनेगा और बेकार पत्थर निकलेगा वह उतना सोना पारिश्रमिक बतौर लेगा। शिल्पी की बात मान ली गई और काम शुरू हो गया। मूर्ति निर्मित हुई और इतिहास बन गया। इतिहास के पन्नों में मूर्ति बनने का समय कहीं पर 12 वर्ष तो कहीं पर इससे भी अधिक समय का मिलता है। मूर्ति बनने के बाद उसकी प्रतिष्ठा बड़ी प्रभावना के साथ हुई। आज भी यह मूर्ति हमें प्रेरणा दे रही है कि पुत्र हो तो चामुंडराय जैसा हो।

अनंत सागर
प्रेरणा
(पच्चीसवां भाग)
22 अक्टूबर, गुरुवार 2020, लोहारिया

अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

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