कहानी : चरित्र ही धर्म का मूल है – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज

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charitra hi dharm ka mul hai

आंखों से देखा और कानों से सुना ही सत्य नहीं होता। मात्र ज्ञान से जाना हुआ ही सत्य होता है। वस्तुनिष्ठ कथनों का आचरण करना चाहिए। चरित्र ही धर्म का मूल है तथा चरित्र का मूल सम्यक दर्शन है।
वर्षा काल का वह समय, जब जीव-जंतु वर्षा के कारण जमीन से बाहर विचरण करने लगते हैं। ऐसे समय में जीवों की हिंसा न हो, इसके लिए संतजन वर्षाकाल के समय चार माह तक एक ही स्थान पर रुककर साधना करते हैं। इसे ही चातुर्मास कहा गया है।

एक बार गुणनिधि नामक मुनिराज एक पर्वत पर मौन तपस्या कर रहे थे। तप के प्रभाव से उन्हें आकाश में चलने की दिव्य शक्ति मिली हुई थी। अतः चार्तुमास समाप्त होने के बाद वे आकाश मार्ग से चले गए। उसी समय मृदुमति मुनि गांव में आहार के लिए आए। गांव के लोगों को लगा कि ये तो गुणनिधि महाराज है। अतः सभी ने उनका आदर सत्कार किया। उन्हें स्वादिष्ट भोजन कराया। मृृदुमति महाराजा यह समझ गए थे कि गांव वालों से समझने में भूल हुई है। भोजन के स्वाद से आसक्त होकर मृदुमति ने किसी से कुछ नहीं कहा। उन्होंने लोगों के साथ धोखा किया। इसके लिए उन्हें तिर्यंच गति मिली। उन्होंने अगले जन्म में हाथी के रूप में जन्म लिया।

कहानी से सीख

हमें हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि हम कभी भी मायाचारी या किसी के साथ धोखा न करें। हमेशा सरल बने रहें। हमें आर्जव धर्म यही सिखाता है। जैसा हमारे मन में है, हमें वैसा ही बोलना चाहिए और काम भी उसी के अनुरूप करना चाहिए।

अनंत सागर
कहानी
पैंतालीसवां भाग
7 मार्च 2021, रविवार, भीलूड़ा (राजस्थान)

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