अंतर्मुखी के दिल की बात – चातुर्मास की व्यवस्था एक चिंतनीय विषय – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज

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दिगम्बर जैन समाज का इतिहास जैन मुनि से प्रारम्भ होता है। क्योंकि देव, शास्त्र, गुरु तो सभी धर्मों में हैं, पर दिगम्बर अवस्था में श्रवण दिगम्बर जैन धर्म में ही होते थे। श्रवण की चर्या में संयम के पालन वाला चातुर्मास भी आता है। चातुर्मास श्रवण और श्रावक दोनो के कल्याण को करने वाला है। चातुर्मास पर अपने दिल की बात आपके सामने रखता रहा हूं।

क्या श्रवण बिना श्रीफल भेंट किए किसी नगर, शहर, क्षेत्र में चातुर्मास नही कर सकता हैं? क्या चातुमार्स के लिए श्रीफल भेंट करना जरूरी है? प्राचीन समय में चातुर्मास की क्या व्यवस्था थी? प्राचीन जैन शास्त्रों में मेरे पढ़ने में अब तक कोई ऐसा प्रसंग नहीं आया कि श्रवणों को चातुर्मास के लिए श्रीफल भेंट किया गया हो। अब तक जितना पढ़ा उसमें यही आया है कि विहार करते-करते जहां पर चातुर्मास का समय हो जाता है, तो श्रवण अपनी भक्तियों के साथ चातुर्मास स्थापना कर लेते हैं। जब चातुर्मास की सूचना मिलती है तो राजा, श्रावक-जन उस स्थल यानी जहां श्रवण में चातुर्मास स्थापना की है, वहां जाकर आहार दान करते थे।

श्रवण अगर मंदिर, क्ष्रेत्र में चातुर्मास नहीं करेगा, तो फिर कहां करेगा! मंदिर तो आत्म-साधना का क्रेंद्र है। तो क्या वापस यही परम्परा नहीं शुरू हो सकती कि हमारे नगर-शहर के मंदिर में श्रवण आएं, उनका चातुर्मास करने का मन हो तो वह स्थापना कर लें और हम उनकी आहार आदि की व्यवस्था करें। क्योंकि मंदिर, क्षेत्र तो साधुओं की साधना स्थली है। श्रवण वहीं चातुर्मास करेंगे, अगर यहां नहीं करेंगे, तो फिर कहां करेंगे? इसका जवाब आप सब खुद ढूंढ़ें।

समाज में संवाद इस विषय पर हो कि अब चातुर्मास की व्यवस्थाएं कैसे की जाएं। न कि इस बात पर बहस हो कि चातुर्मास करवाना है या नहीं। आप सबके मन में प्रश्न उठ सकता है कि चतुर्थ काल जैसे साधु कहां रहें? अब एक प्रश्न है। इस प्रश्न को स्वयं से करना चाहिए। चतुर्थ काल जैसे श्रावक अभी है क्या? स्वयं से इन प्रश्नों को करने पर उसका उत्तर अपने-आप मिल जाएगा। उसे कही ढूंढ़ने की जरूरत नहीं होगी।

समाज को करना तो यह चाहिए कि आपके मंदिर में जो भी संत आए, उन्हें हम श्रीफल निवेदन कर यह कहें कि आप अपनी साधना और समाज के धर्म लाभ के लिए यहां चातुर्मास करें। यह मेरा विचार रहा है। आप सबको भी इस पर सोचना चाहिए।

शब्दार्थ व्यवहारिक
श्रवण-मुनि, चतुर्थ काल-जिसमें तीर्थंकरों का जन्म होता है।

अनंत सागर
अंतर्मुखी के दिल की बात
तैतालीसवां भाग
25 जनवरी 2021, सोमवार, बांसवाड़ा

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