छहढाला दूसरी ढाल छंद 9

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छहढाला

दूसरी ढाल

गृहीत-मिथ्यादर्शन और कुगुरु का स्वरूप

जो कुगुरु कुंददेव कुधर्म सेव, पोषे चिर दर्शन मोह एव।
अन्तर रागादिक धरैं जेह, बाहर धन अम्बर तैं सनेह।।9।।

अर्थ – जो कुगुरु, कुदेव, कुधर्म की सेवा करता है,वह चिरकाल तक दर्शन्मोह को ही पुष्ट करता है। जो भीतर में राग-द्वेष से सहीत हैं और ऊपर से धन,वस्त्र आदि से मोह रखते वह कुगुरु का स्वरुप है।

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