छहढाला पांचवी ढाल छंद-6

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छहढाला

पांचवी ढाल

एकत्व भावना

शुभ अशुभ करम-फल जेते, भोगै जिय एकहि ते-ते। सुत दारा होय न सीरी, सब स्वारथ के हैं भीरी ॥6॥

अर्थ- पुण्य और पाप कर्मों के जितने फल हैं उनको यह जीव अकेला ही भोगता है; पुत्र, स्त्री, कोई साथी नहीं होते, सब मतलब के गरजी हैं, ऐसा विचार करना एकत्व भावना है।

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