छहढाला पहली ढाल छंद 03

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छहढाला

पहली ढाल

संसार भ्रमण का कारण

ताहि सुनो भवि मन थिर आन, जो चाहो अपनो कल्याण।
मोह-महामद पियो अनादि, भूल आपको भरमत वादि॥3।।

अर्थ – हे भव्यजीवों! यदि तुम अपनी भलाई या सुख चाहते हो तो उस कल्याणकारी उपदेश को स्थिर मन से सुनो। यह जीव अनादिकाल से मोहरूपी मदिरा-शराब पीकर अपने स्वरूप को भूलकर व्यर्थ में चारों गतियों में भ्रमण कर रहा है।

विशेषार्थ – रत्नत्रय की प्राप्ति की योग्यता युक्त जीव को भव्य कहते हैं। परपदार्थों में अपनत्व बुद्धि होना, मोह कहलाता है। जिसकी आदि अर्थात् प्रारंभ न हो, उसे अनादि कहते हैं।

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