अंतर्भाव : दशरथ मुनि का आत्मचिंत्तन – मुनि श्री पूज्य सागर जी

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जब राजा दशरथ मुनि बन गए, उस समय उन्हें अपने पुत्र आदि के प्रति स्नेह का भाव जागृत हो गया। तब उन्होंने आत्मचिंत्तन से अपने आप को स्थिर किया। पद्मपुराण के पर्व 32 में लिखा है कि उन्होंने क्या चिंतन किया? उसका कुछ हिस्सा आप तक पहुंचा रहा हूं।

संसार के दु:ख का मूल कारण इस जगत का स्नेह है, इसे धिक्कार हो। स्नेह से कर्म बनते हैं, मैंने अनन्त जन्मों को धारण किया। उनमें गर्भ जन्म के अनेक माता-पिता, भाई, पुत्र हुए, वे सब कहां गए? अनेक बार मैंने देवों के फल भोगे, अनेक बार नरक के दु:ख भोगे। तिर्यंच गति में मैंने शरीर को अनन्त बार दूसरे जीवों ने खाया, अन्य जीवों के शरीर का मैंने भक्षण किया, नाना योनियों में मैंने बहुत दु:ख भोगे और बहुत बार रुदन किया। रुदन के शब्द सुने, अनेक बार वीणा बांसुरी वादित्रों के नाद, गीत सुने, नृत्य देखे, देवों में मनोहर अप्सराओं के साथ भोग किया।

इस संसार में कर्म के सहयोग से मैंने क्या-क्या नहीं देखा, क्या-क्या नहीं सुना, क्या-क्या नहीं सूंघा और क्या-क्या नहीं खाया। वह कौन सा ऐसा शरीर नहीं! जिसे मैंने धारण नहीं किया हो। तीनों लोक में कोई ऐसा जीव नहीं है, जिसके साथ मेरे अनेक नाते-रिश्ते नहीं हुए। यह पुत्र कई बार मेरे पिता हुए, माता बने, शत्रु-मित्र हुए, ऐसा कोई स्थान नहीं, जहां मैंने जन्म-मरण नहीं लिया हो। यह शरीर के भोगादि सब अनित्य है। इस जगत में कोई शरण नही हैं। मैं सदा अकेला हूं। यह शरीर अपवित्र है। मैं पवित्र हूं। धन्य हैं मुनि, जिनके उपदेश से मोक्ष मार्ग प्राप्त किया। इसलिए अब पुत्रों की क्या चिंता। ऐसा विचारकर दशरथ मुनि निर्मोह भाव को प्राप्त हुए।

शब्दार्थ व्यहवारिक

स्नेह- लगाव, भक्षण- खाया, रुदन- चिल्लालकर रोना, अनित्य- नाशवान, निर्मोह- मोह व स्नेह से रहित।

अनंत सागर
अंतर्भाव
चालीसवां भाग
29 जनवरी 2021, शुक्रवार, बांसवाड़ा

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