उन्तीसवां दिन : धर्म ही मृत्यु पर विजय और मृत्यु को सुधारने का मार्ग – अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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मुनि पूज्य सागर की डायरी से

मौन साधना का 29वां दिन। मनुष्य के जीवन में मृत्यु ही एक ऐसा मेहमान है जो बिना बुलाए और अचानक कब आ जाता है, पता भी नहीं चलता। सारा जीवन इंसान मृत्यु से डरता रहता है। मनुष्य धार्मिक स्थलों और डॉक्टरों के पास भी मृत्यु के भय से ही जाता है। हर पल मृत्यु मनुष्य के पीछे रहती है और वह कब मनुष्य से आगे हो जाए, उसका अहसास भी नहीं होने देती। यह एक कड़वा सत्य है कि मनुष्य अपनी दैनिक क्रियाओं (यात्रा, भोजन, विश्राम और व्यापार) में भी मृत्यु से डरा ही रहता है। जब व्यक्ति मृत्यु के भय से डॉक्टर के पास जाता है तो वह भी यही कहता है कि हम भी भगवान के भरोसे हैं, हम तो केवल अपना काम कर रहे हैं।

हां, पर यह भी सत्य है कि धर्म भी व्यक्ति को मृत्यु से बचा नहीं सकता। धर्म मृत्यु के कारणों को सुधार जरूर  सकता है। धर्म ही एक ऐसा मार्ग है जहां से मृत्यु पर विजय और मृत्यु को सुधारने का रास्ता मिलता है। धर्म मनुष्य को दैनिक क्रियाओं को निर्भय होकर करने का रास्ता दिखाता है। धर्म यह सिखाता है कि कर्मों पर ध्यान दो तो मृत्यु अपने आप सुधर जाएगी। धार्मिक क्रियाओं में भी मनुष्य उलझ कर रह जाता है कि क्या करूं और क्या नहीं करूं। मैंने ऐसा कर दिया तो ऐसा हो जाएगा। यह तनाव भी मृत्यु को बिगाड़ देता है। तुम्हें अपनी मृत्यु को सुधारना है तो तुम्हें अपनी क्रिया, विचार और भावना को ठीक करना होगा। सब कुछ अपने आप ही ठीक हो जाएगा। धर्म ही मृत्यु से सामना करना सिखाता है।

मृत्यु उसे ही डराती है जो दूसरो को दुखी कर खुद को सुखी रखना चाहता है। यदि व्यक्ति अपनी इस कमजोरी को भीतर से निकाल दे तो वह मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकता है। मृत्यु कर्म के अधीन है, मृत्यु के बाद व्यक्ति कहां जाएगा, यह भी कर्म से ही तय होता है। मनुष्य को मृत्यु के डर से दूर रहना चाहिए  तभी वह अपनी दैनिक क्रियाएं निडर और उत्साह से कर सकता है। निर्मल और सहज मन के व्यक्ति से मृत्यु भी डरती है। व्यक्ति को अपने आचरण, शब्द और विचारों पर हमेशा ध्यान देना चाहिए। ऐसा करने से मृत्यु भी सोचने पर मजबूर जाती है।

गुरुवार, 2 सितम्बर, 2021 भीलूड़ा

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