श्रावक:- ‘सुखी जीवन के लिए धन नहीं पुण्य कमाएं’- अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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नीम के पत्तों के रस में कितनी भी शक्कर मिलाओ पर नीम के पत्तों के रस का स्वाद कड़वा ही रहेगा। वह मीठा नही हो सकता। इसी प्रकार धन आदि सम्पदा कितनी भी हो, वह दुख का ही कारण है। धन से कोई सुखी नही हो सकता और जो सुख दिखाई देता भी है वह सुख नही सुख का आभास मात्र है। इस संसार में अगर कुछ कमाना ही है तो पुण्य कमाओ। जितना समय, दिमाग, मेहनत, सहन शक्ति हम धन कमाने में लगाते हैं उतना समय पुण्य कमाने में लगा दें तो धन अपने आप आ जाएगा। आचार्यांे ने कहा है कि धन सम्पदा आदि पुण्य से ही आते हैं। धन से जो सुख का अनुभव होता है वह असल में दुख का कारण है। जो धन पुण्य से आता है वही शाश्वत सुख का कारण बनता है।
जैसे हम सर्प को कितना भी दूध पिलाएं वह दूध जहर ही बनेगा वैसे ही धन कितना भी कमाओ वह सुख नही दे सकता है। वास्तव में सुखी जीवन के लिए धन की नहीं पुण्य की आवश्यकता है और पुण्य से धन अपने आप आता है। पुण्य से जो धन कमाया जाता है वह मुक्ति का कारण बनता है और जो सुख के निमित्त से धन कमाता है वह धन संसार के दुख का कारण बनता है। जब पुण्य से धन मिलता है तो धन क्यों कमाएं, पुण्य ही कमाने में अपना समय लगाएं।
रत्नकरण्ड श्रावकाचार में आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने कहा है कि-
यदि पापनिरोधोऽन्य-सम्पदा किं प्रयोजनम्।
अथ पापास्रवो-ऽस्त्यन्य-सम्पदा किं प्रयोजनम्।।
अर्थात
यदि पाप का आस्रव (आना) रुक जाता है तो अन्य सम्पति से क्या प्रयोजन है? और यदि पाप का आस्रव (आना) होता रहता है तो भी अन्य सम्पत्ति से क्या प्रयोजन है? पाप के कारणों का त्याग कर के पापास्रव को रोको। पुनः सभी सम्पदाएं तुम्हें स्वयं मिल जाएंगी।

अनंत सागर
श्रावक
9 दिसम्बर, 2020, बुधवार, बांसवाड़ा
(बत्तीसवां भाग)
‘सुखी जीवन के लिए धन नहीं पुण्य कमाएं’
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

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