भय मनुष्य को जीते जी मार देता है – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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भय एक कर्म है जो मनुष्य को जीते जी मार देता है। डर को भय कहते हैं। जिस कर्म के उदय से जीव को सात प्रकार का भय उत्पन्न होता है, वह भय कर्म है। डर उसे ही लगता है जिसे इस बात का एहसास हो जाए कि वह गलत है। भय से मानसिक रोग का जन्म होने लगता है। भयग्रस्त व्यक्ति वर्तमान में जीने के बजाए भूत और भविष्य की कल्पनाओं में जीना शुरू करता है। जिससे उसके अशुभ कर्म का बन्ध होता है। जैन सिद्धांत में सात प्रकार के भय बताए गए है-इहलोक, परलोक, अरक्षा, अगुप्ति, मरण, वेदना और आकस्मिक भय ये सात भय हैं।

आइए इनको विस्तार से जानते हैं
मेरे इष्ट पदार्थ का वियोग न हो जाये और अनिष्ट पदार्थ का संयोग न हो जाये इस प्रकार का विलाप करना इहलोक भय कहते हैं।
भविष्य के बारे में सोचना परलोक भय है। यदि स्वर्ग में जन्म हो तो अच्छा है, मेरा दुर्गति में जन्म न हो इत्यादि बातों से हृदय का आकुलित होना पारलौकिक भय कहलाता है।
शरीर में वात, पित्तादि के प्रकोप से आने वाली बाधा वेदना कहलाती है। मैं निरोग हो जाऊँ, मुझे कभी भी वेदना न हो, इस प्रकार का बार-बार चिंत्वन वेदना भय है।
जैसे कि बौद्धों के क्षणिक एकांत पक्ष में चित्त क्षण-प्रति-क्षण नश्वर होता है वैसे ही पर्याय के नाश के पहले अंशिरूप आत्मा के नाश की रक्षा के लिए अक्षमता अत्राणभय (अरक्षा भय) कहलाता है।
असत् पदार्थ के जन्म को, सत् के नाश को मानने वाले, मुक्ति को चाहने वाले शरीरधारियों को अगुप्ति भय से कहाँ अवकाश है।
मैं जीवित रहूँ, कभी मेरा मरण न हो, अथवा दैवयोग से कभी मृत्यु न हो, इस प्रकार शरीर के नाश के विषय में जो चिंता होती है, वह मृत्युभय कहलाता है।
अकस्मात् उत्पन्न होने वाला महान् दुःख आकस्मिक भय माना गया है। जैसे कि बिजली आदि के गिरने से प्राणियों का मरण हो जाता है, या मैं सदैव निरोग रहूँ। कभी रोगी न होऊँ। इस प्रकार व्याकुलित चित्त से होने वाली चिंता आकस्मिक भय कहलाता है।

अनंत सागर
कर्म सिद्धांत
(उनतीसवां भाग)
17 नवम्बर, 2020, मंगलवार, बांसवाड़ा

अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

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