सफलता की प्रथम सीढ़ी – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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बच्चों आज पाठशाला में हम बात करेंगे आस्था और श्रद्धा की। क्योंकि विश्वास इसी धुरी पर टिका होता है और इसके बिना कभी कोई भी कार्य सफल नहीं होता है। आस्था अर्थात् पूर्वकाल में जो संत, महापुरुष इत्यादि हुए हैं उनमें या प्राचीन काल से जुड़ी कोई आध्यात्मिक परम्परा, ईश्वरीय पूजा अथवा ग्रन्थ के द्वारा या अन्य श्रुतियों के पठन- पाठन पर जो भाव की उत्पत्ति होती है, जिसमें स्वतः ही मन रमने लग जाता है।

श्रद्धा अर्थात् वह भाव जो हमें वर्तमान में जीवंत संतो, महापुरुषों पर होता है; यह प्रत्यक्ष होता है, इससे भी आध्यात्मिकता की ही ओर रुझान होता है, किंतु यह विश्वास की पहली सीढ़ी की तरह है और इस शाब्दिक अर्थ की तीव्रता आस्था से तनिक कम है। पूर्वकाल में रहे संतजन, महापुरुषों आदि के द्वारा प्रदत्त ज्ञान, श्रुतियाँ एवं देववाणी का महत्त्व सुन सुन कर हमारे अंदर वर्तमान के संत महात्माओं के प्रति श्रद्धा स्थापित हो जाती है। इसलिए कह सकते हैं की आस्था से ही श्रद्धा का जन्म होता है। या कहें के यह एक दूसरे के पूरक हैं। बच्चों, एक लौकिक उदाहरण के साथ इनके इस भेद को तनिक और अच्छे से समझते हैं। बच्चों जब तुम बड़े होते हो तो तुम्हारें माता पिता तुम्हें अच्छे से अच्छे शैक्षणिक संस्थान में दाखिला करवाते हैं। उस संस्थान का चयन वह और लोगों की राय लेकर, पुस्तकें पढकर इंटरनेट इत्यादि का प्रयोग कर देखते हैं की कौन- कौन से संस्थानों से प्रतिष्ठित डाक्टर, वकील, इंजीनियर आदि निकले हैं …. यह बड़ी बारीकी से देखपरख कर वह तुम्हारा दाखिला करवाते हैं। एक अच्छे संस्थान की खोज में पहले आस्था ने अपनी जगह बनाई और उसके पश्चात जब जुटाई गई जानकारी से परिपूर्ण रूप से संतुष्ट हुए की मेरा बेटा बड़ा आदमी बनेगा क्योंकि यहां जो भी पढ़ता है वह एक सफल इंसान बनता है, तब समझो मन में श्रद्धा घर कर गई।

वैसे ही बच्चों अगर तुम अपने जीवन में भगवान राम और महावीर जैसी शांति, सुख और समृद्धि लाना चाहते हो तो तुम्हें क्या करना होगा वह हम तुम्हें आज बताएंगे। राम और महावीर भगवान बनने से पहले अपने सांसारिक जीवन में मर्यादा के साथ रहे और सब के मन में अपनी जगह बनाए। तुम इन महापुरुषों से जुड़ी गाथाओं, प्राचीन ग्रन्थों और परम्पराएं बताने वाली बातों को अपनी दिन की चर्चा में शामिल कर लो। जिससे धीरे धीरे तुम्हारे अंदर आस्था का जन्म हो। आस्था का जन्म होते ही तुम्हारे अंदर वर्तमान के संतो,महापुरुषों के प्रति श्रद्धा का जन्म होगा। उसी के साथ तुम धर्म,धार्मिक अनुष्ठान और धर्मात्माओं के साथ जुड़ने लग जाओगे। तुम्हारे अंदर धीरे धीरे दया, ममता, करुणा, प्रेम का जन्म होगा। विनय का विस्तार होगा। तुम सभी का आदर-सम्मान करने लगोगे। तुम अपने सांसारिक जीवन में भी कभी दूसरों से शत्रुता नहीं करोगे, झगड़ा नहीं करोगे। सब से प्रेम से बात करोगे। एक दिन ऐसा आएगा की तुम अपने आप को इतना निर्मल और पवित्र बना लोगे के ‘अहम ब्रह्मास्मि› का भाव आना निहित होगा। क्योंकि परब्रह्म तो हर आत्मा में हैं, देर है तो थोड़ा पुरुषार्थ का उसे अपने भीतर जागृत करने की और उससे एकाकार होने की। तो बच्चों आज से तुम आस्था और श्रद्धा को अपने जीवन का अंग बना लो।और भगवान महावीर और राम की तरह सकल विश्व उद्धारक बन जाओ। फिर मिलते हैं अगली पाठशाला में एक नई बात के साथ।
तुम्हारा

अंतर्मुखी

अनंत सागर

पाठशाला
(दूसरी)
9 मई 2020, उदयपुर

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