पहला धर्म है स्वयं को मर्यादित बनाना – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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आज पाठशाला में बात करेंगे कि मनुष्य की पहचान उसके व्यक्तित्व और कृतित्व से होती है। यही हमारे प्राचीन शास्त्रों में लिखा है। आज भी हम मनुष्य के व्यक्तित्व से प्रभावित होते हैं। पर, पाश्चात्य संस्कृति का न जाने कैसा प्रभाव आज मनुष्य पर पड़ा है कि उनके पहचान की परिभाषा ही बदल गई है। आज मनुष्य की पहचान हम उसके कपड़े, खान-पान, रहन-सहन, बात-चीत आदि से कर रहे हैं, जो आगे जाकर धीरे-धीरे हमसब के लिए खतरनाक साबित हो रही है। इस खतरे को आज हम देख भी नहीं पा रहे हैं।
इसके कारण आज परिवार में लाज-शर्म तक नहीं रही है। हमारे भारत में पत्नी के लिए पति परमेश्वर का रूप समझता जाता है और पत्नी को देवी का स्थान प्राप्त है। वह रिश्ता भी कमजोर हो रहा है। स्थिति यह है कि पति पत्नी का रिश्ता कब टूट जाए, उसका पता ही नहीं चलता है। कई स्थानों पर आज यह रिश्ते महज इसलिए बने हुए हैं कि समाज में लोग-बाग क्या कहेंगे, इसलिए बने हुए हैं। इस स्थिति में अन्य रिश्तों की क्या बात करें! कुल मिलाकर अब तो रिश्तों के मायने ही खत्म होते जा रहे हैं। अब तो कई बार काम-वासना, भोग विलास के लिए ही रिश्ते बनते दिखाई दे रहे हैं। इसका असर व्यक्ति के व्यवहार पर दिखाई देता है। उस व्यवहार का असर भिन्न-भिन्न रूपों में परिवार और समाज पर होता है। इसलिए तो परिवार और समाज में संवाद कम होता जा रहा है। कुल मिलाकर संवादहीनता की स्थिति आ गई है।
इसलिए आज घर, परिवार, समाज की मर्यादा खत्म होते जा रही है। बड़े-छोटे का भेद खत्म होता जा रहा है। पहनावे के साथ हर प्रकार की मर्यादाएं टूट रही हैं। यहां तक कि बोलने की मर्यादा भी खत्म होती दिख रही है। इन सब की वजह से आपस में गहरे मतभेद होते जा रहे हैं। फिर धीरे-धीरे मनभेद हो जाता है। इन सब के कारण मनुष्य अपना अस्तित्व और पहचान दोनों समाप्त कर लेता है। जब तक मनुष्य का पहनावा और खान-पान आदि नहीं सुधर जाए, तब तक इसी प्रकार से मर्यादाएं टूटती चली जाएंगी। इसलिए आइये, हमसब स्वयं को मर्यादित बनाएं।
अनंत सागर
पाठशाला
(पैतीसवां भाग)
26 दिसम्बर 2020, शनिवार, बांसवाड़ा

अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

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