सुख, शांति के लिए कमजोरी को स्वीकार करो और उसे दूर करो – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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पड़ोसी हमारे अनुकूल हो तो घर में रहने का आनंद आता है और अगर पड़ोसी ठीक नही हो तो घर में रहना मुश्किल हो जाता है। छोटी छोटी बातों पर रोज झगड़े होते हैं। इन्हीं झगड़ों से टेंशन बढ़ जाता है। धीरे धीरे मनुष्य अपना सन्तुलन खोने लगता है वह भी धीरे धीरे पड़ोसी जैसा हो जाता है। वह भी झगड़े करने लगता है। अब उसे अपने दुःख, टेंशन का होश नहीं रहता। वह इस बात से खुश रहता है कि मैं भी पड़ोसी जैसा बन गया हूं और उसे टेंशन, दुःख आदि दे रहा हूं। अब आप ही सोचिए बुद्धिहीन, अज्ञानी कौन हुआ… जिसने अपना शांत स्वभाव छोड़ दिया और अपने आप को अशांत स्वभाव वाला बना लिया या पड़ोसी जो जैसा था, वैसा ही रहा। उसने अपना स्वभाव नहीं छोड़ा।
जब हमसे कोई कहता है कि आप ऐसे कब से हो गए, पहले तो ऐसे नही थे तो जवाब यही मिलता है कि क्या करूँ यह पड़ोसी ही ऐसा मिला कि मैं भी इसके जैसा हो गया। इसके जैसा नहीं बनूं तो यहां रह नही सकता। पर क्या कभी तुमने सोचा की तुम कितने कमजोर निकले कि तुम अपना शांत स्वभाव छोड़कर अशान्त स्वभावी बन गए और पड़ोसी जैसे बन गए। हम पड़ोसी जैसे बन गए पर पड़ोसी को अपने जैसा नहीं बना पाए। ऐसे में हम ही सोचें कि कमजोर कौन हुआ, दोष किसका रहा…. हमारा या पड़ोसी का?
हमें स्वीकार करना होगा की दोषी हम है क्योंकि हमने अपना स्वभाव छोड़ा है। हम पड़ोसी को अपने जैसा नहीं बना सके। पड़ोसी तो जैसा था वैसा ही रहा। हम बदल गए।
बस कुछ ऐसा ही आध्यात्म और धर्म के बारे में है। आत्मा तुम हो और शरीर पड़ोसी है। अगर हम शरीर के अनुरूप हो गए तो अशुभ कर्मो के कारण टेंशन, दुःख, अशांति के अलावा कुछ नही मिलेगा। शरीर को हमने अपने अनुरूप कर लिया अर्थात जितना जरुरी ही उतना उसे काम लिया तो समझना शुभ कर्मो के कारण तुम टेंशन मुक्त, दुःख रहित, शांत जीवन जी सकते हो क्योंकि आत्मा का स्वभाव छूटना अशुभ कर्म और आत्मा के स्वभाव में रहना शुभ कर्म के बन्ध का कारण है। कर्मो का बंधन शरीर और आत्मा के मिलने से ही होता। जीवन में जो दुःख आदि आते है वह हमारी कमजोरी के कारण आते हैं। हम अपनी कमजोरी शरीर पर डाल देते है, पर ध्यान रखना कमजोरी को छिपाने के बजाए स्वीकार करना चाहिए और उसे दूर करना चाहिए तभी सुख, शांति आदि मिलेगी।
सागर
कर्म सिद्धांत
(छब्बीसवां भाग)
27 अक्टूबर, 2020, मंगलवार, लोहारिया

अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

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