गलती को स्वीकार करने वाला महान बन जाता है – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantकर्म सिद्धांत

कोरोना महामारी के चलते कोरोना में उपयोग आने वाली दवाईओ की कालाबाजारी हो रही है। यहां तक कि कोरोना में आने वाले साधनों का धंधा बना लिया है। नेता लोग एक दूसरे के सहयोग के बजाए एक दुसरो पर कटाक्ष कर रहे हैं। क्या ऐसा करने से व्यवस्था सुधरेंगी या महामारी दूर हो जाएगी? अगर गलती, चूक हुई है तो उसे स्वीकार कर सुधारें, तभी इस संकट से बचा जा सकता है। एक-दो की गलती की सजा सब क्यों भोगें? स्वयं की गलती को स्वीकार करना ही महानता है। कर्म सिद्धंत कहता है कि हमने हजारों अशुभ कर्म किए हों, पर एक शुभ कर्म भी हमारे जीवन को अमर बना सकता है। वहीं हजारों शुभ कर्म किए हों पर एक अशुभ कर्म जीवन को तहस नहस कर सकता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए अपनी गलती को मानकर सुधर जाना चाहिए। जो कर्म अब तक किए हैं उन्हें सुधार लें तो संकट से बच सकते हैं नहीं तो तबाही से कोई नही बचा सकता है।
पद्मपुराण के पर्व अस्सी में प्रसंग आया है जिससे पता चलता है कि गलती को स्वीकार कर कर्म को समझने वाला महान बन जाता है।

रावण के मरण के बाद इंद्रजीत मुनि बन गए और अनेक ऋद्धियाँ प्राप्त कर आत्मसाधना करते हुए रत्नत्रय को मजबूत किया तथा ध्यानरूपी अग्नि के माध्यम से कर्मरूपी शत्रुओ को नाश कर मुक्ति को प्राप्त किया। मेघवाहन ने भी मुनि बनकर तप कर केवलज्ञान प्राप्त किया और कुम्भकर्ण ने भी मुनि दीक्षा धारण कर शुभ भावों के माध्यम से केवलज्ञान को प्राप्त किया। यह सब परमपद को प्राप्त हुए। मुनि इंद्रजीत और मुनि मेघवाहन ने जहां विराजमान होकर तप किया वह क्षेत्र मेघरव तीर्थ नाम से प्रसिद्ध हुआ और मुनि कुम्भकर्ण जिस नर्मदा के किनारे से निर्वाण को प्राप्त हुए वह पीठरक्षत तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अगर इंद्रजीत आदि भी रावण की तरह अहंकार में रहते तो वह महान नहीं बनते बल्कि अपने अस्तित्व को नष्ट कर लेते।
अब आगे क्या करना है यह आप को समझना है। रावण बनना है या इंद्रजीत आदि बनना है तय आप को करना है।

अनंत सागर
कर्मसिद्धांत ( चौपनवां भाग)
11 मई ,2021,मंगलवार
भीलूड़ा (राज.)

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