श्रावक :- ‘सत्कर्म को लोभ से नहीं, मानव-धर्म समझकर करें ’- अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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भगवान की पूजन और भक्ति से, संतों की सेवा से, धार्मिक पुस्तकें पढ़ने से मुझे स्वर्ग या संसारी सुख मिल जाएगा… इस भाव से कुछ मत करना। यह भाव रखोगे तो जो मिलना होगा वह भी नही मिलेगा । यह सब तो मनुष्य के कत्र्तव्य हैं। निष्ठा के साथ कत्र्तव्य का पालन करने वाले को बिन मांगे सब कुछ मिल जाता है। मांगा तो वहां जाता है जहां विश्वास नहीं हो कि मुझे मिलेगा या नहीं। भगवान की आराधना से मनुष्य कर्म रहित हो जाता है तो फिर क्या संसार के अशुभ कर्म नही कटेंगे….. आवश्य ही कटेंगे। धार्मिक अनुष्ठान स्वर्ग या संसारी सुख की इच्छा से नहीं करने चाहिए बल्कि इसलिए करने चाहिए कि ये अशुभ कर्मों की निर्जरा का कारण बनते हैं। मांगने का काम तो भिखारी का होता है। वह जीवन भर मांगता ही रहता है फिर भी उसे उसकी इच्छा का कुछ नही मिलता है और उसकी कभी भी तृप्ति नही होती है। कर्तव्य का पालन, सम्मान, मेहनत से जो मिलता है वह सम्मानजनक होता है। हमने जितने की कल्पना नहीं की थी उससे अधिक ही मिलता है। जिनेन्द्र भगवान की पूजन, धार्मिक अनुष्ठान में भी ऐसा ही कुछ है। यहां पर मांगने से कुछ नही मिलता बल्कि बिन मांगे ही सब कुछ मिल जाता है। धार्मिक अनुष्ठान नियम से मोक्ष प्रदान करता है…. तो क्या उससे स्वर्ग या संसार आदि के सुख नही मिल सकते…. अवश्य मिल सकते हैं, बस धैर्य रखना होता है।
आचार्य पूज्य पाद स्वामी ने इष्टोपदेश में कहा है कि-
यत्र भावरू शिवं दत्ते, द्यौरू कियद्दूरवर्तिनी
यो नयत्याशु गव्यूतिं क्रोशार्धे किं स सीदति ॥४॥
अर्थात
जो भाव मोक्ष प्रदान कर सकते है वेे क्या स्वर्ग आदि के सुख नही दे सकते….बिल्कुल दे सकते हैं। जैसे जो मनुष्य दो कोस तक वजन उठाकर चल सकता है वो क्या वह आधा कोस तक नही जा सकता है… बिल्कुल जा सकता है ।
अनंत सागर
श्रावक
(तैतीसवां भाग)
16 दिसम्बर, 2020, बुधवार, बांसवाड़ा
अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

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