गृहस्थ दशा में विवेकपूर्वक जीवन – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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श्रावक के जीवन में अनेक तरह की समस्याएं आती हैं। क्यों? उनका घर, परिवार, व्यापार आदि उससे जुड़े होते हैं। इनके बिना श्रावक का संसार चल भी नहीं सकता है। इन्हीं के बीच रहकर उन्हें उनका समाधान भी करना है। तो क्या करें? इसका समाधान है जैनधर्म के शास्त्र पद्मपुराण में, जिसे पढ़कर हम समझ सकते हैं। पद्मपुराण में राम के जीवनचरित्र का वर्णन किया गया है। राम ने वन में जाना इसलिए तय किया क्योंकि वह पुत्रधर्म का निर्वाह कर रहे थे। पिता के वचन मिथ्या न सिद्ध हो जाएं, इसीलिए उन्होंने वनवास स्वीकार कर लिया। जब रावण ने सीता का हरण कर लिया तो उन्होंने महाशक्तिशाली से युद्ध करने का निर्णय कर पतिधर्म का निर्वहन किया। जब सीता को वन में छुड़वाया, उस समय उन्होंने राजधर्म निभाया। विभीषण का राज्याभिषेक करने के बाद जब वह चलने लगे तो कुछ भी लेकर नहीं चले। इस तरह उन्होंने मानवता के धर्म का निर्वाह किया। वनवास समय में जितने भी दुःखी और संकट में फंसे मनुष्य मिले, सबकी मदद की। ऐसा करके उन्होंने दयाधर्म का निर्वाह किया। साथ ही जब- जब साधु -संत मिले तो उन्हें आहार, दान आदि देकर श्रावक धर्म का निर्वाह किया।

परिवार में रहकर कब और क्या निर्णय करना चाहिए, कौन सा निर्णय भविष्य के लिए उत्तम है, इन सबका ज्ञान पद्मपुराण में उल्लखित राम के जीवन से मिल सकता है। इसलिए तो राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं क्योंकि उन्होंने कभी भी अपने रिश्तों की मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। आप संकल्प करें- राम की जीवन को पढ़ने का।

अनंत सागर
श्रावक
26 मई 2021, बुधवार
भीलूड़ा (राज.)

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