भाग तीस : हमेशा क्रोध और कषाय से मुक्त रहते थे आचार्य श्री शांतिसागर महाराज – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantशांति कथा

आचार्य श्री शांतिसागर महाराज के जीवन के कई घटनाएं ऐसी हैं, जो दिगम्बर संतों के लिए अनुकरणीय हैं। बात है ग्राम कोगनोली की, जहां गांव के बाहर स्थित एक गुफा में बैठकर आचार्य श्री शांतिसागर बैठकर ध्यान-स्वाध्याय किया करते थे। वह केवल आहार आदि के लिए गांव में आते थे। एक बार एक पागल व्यक्ति गुफा में आया और आचार्य श्री से रोटी मांगने लगा। उस वक्त आचार्य श्री ध्यान अवस्था में थे तो उन्होंने ध्यान नहीं दिया। वह मौन ही रहे। यह देखकर वह पागल शोर करने लगा और ईंटें फेंक कर उपद्रव करने लगा किंतु आचार्य श्री शांतिसागर जी एकदम शांत और ध्यानावस्था में ही बैठे रहे। आचार्य श्री की इस प्रकार की दृढ़ता को देखकर पागल वहां से चला गया। दूसरी घटना भी यहीं की है। आचार्य श्री गुफा से कोगनोली गांव में आहार के लिए रोज जाते थे। जिस रास्ते से वह जाते थे, उस रास्ते पर एक विप्रराज का घर था। उसने आचार्य श्री के लिए अपशब्दों का प्रयोग करते हुए उनके उस रास्ते से जाने पर आपत्ति जताई। महाराज ने भी सोचा कि इसके हृदय को क्यों दुख दूं और उन्होंने अपने आने-जाने का रास्ता बदल दिया । लगभग दो सप्ताह बाद उसी ब्राह्मण(विप्रराज) को अपनी किए कार्य पर दुख हुआ और उसने प्राश्चियत करते हुए आचार्य श्री के पास जाकर अपने किए कार्य पर क्षमा मांगी, साथ ही उनसे निवेदन किया कि वह पहले की भांति उसके घर के सामने वाले रास्ते से निकला करें। आचार्य श्री ने वापस उसी रास्ते ने निकलना शुरू कर दिया। आचार्य श्री ने कहा कि मुझे क्रोध-कषाय इसलिए नहीं आया था क्योंकि दीक्षा के पहले ही गुरु ने सचेत कर दिया था कि हमेशा कषाय विमुक्त रहना, इस प्रकार के कष्ट जीवन में आते रहेंगे। इन्हें सहन करना, तभी शांति से आत्मचिंतन कर सकते हैं।

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