अंतर्मुखी के दिल की बात:- ‘नए वर्ष में सतर्कता बरतें, सतकर्म की ओर बढ़ें’- अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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हम सब चार दिनों बाद साल 2020 को अलविदा कहेंगे और 2021 का स्वागत करेंगे। अगर 2021 में कुछ विशेष प्राप्त करना है, कुछ नया करना है, हमारे कार्य से लोगो को प्रेरणा मिले कुछ ऐसा करना है तो सन् 2020 की यादों को स्मृति पटल पर रखना होगा। सन् 2020 की यादों को स्मृति पटल पर रखते हुए उन गलतियों से सीख लेकर और दोबारा वैसी गलती नही करेंगे, कुछ ऐसे संकल्प के साथ 2021 की ओर बढ़ाना होगा। तभी 2021 में हम मन, वचन, कार्य और आर्थिक रूप से सुखी हो पाएंगे।
आप सब यह मत समझ लेना कि 2020 में जो हुआ, वह 2021 में नहीं होगा, बल्कि ऐसा भी हो सकता है कि स्थिति इससे भी खराब होती जाए। इसलिए पहले से अधिक सावधनी, सतर्कता रहने की आवश्यकता है। क्योंकि, जैसे-जैसे समय निकलता जा रहा है, वैसे-वैसे संकट भी बढ़ेंगे। यही धार्मिक-शास्त्र में कहा गया है। भगवान महावीर ने संकटों से बचने के लिए हमें अपने आपको धार्मिक, सामाजिक और लौकिक कार्यों से जोड़ने का सन्देश दिया। धार्मिक कार्यों से जोड़ने के लिए भगवान महावीर का सन्देश ‘अहिंसा परमो: धर्म’ अर्थात अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है। इसके लिए जीवन में इस बात को समझना होगा कि हिंसा कहां-कहां होती है। फिर उसका समाधान देखना चाहिए। घर में संस्कृति मन्दिर की स्थापना करने का संकल्प करें। जहां मन, वचन और कार्य को पवित्र करने का साधना हो। सामाजिक कार्य से जुड़ने के लिए उपदेश देते हुए कहा गया कि ‘जीयो और जीने दो।’ अर्थात स्वयं भी जीयें और दूसरों को भी जीने दें।
समाज में नए-नए कार्य करके आने वाली पीढ़ी को रोजगार के साधन उपलब्ध करवाने के साथ उन्हें सही मार्ग-दर्शन के लिए समय-समय पर विद्वानों के व्याख्यान करवाने का संकल्प करें। लौकिक कार्यों को प्रेरणा देने के लिए भगवान महावीर का संदेश है कि ‘परस्परोपग्रहों जीवानाम्’ अर्थात एक दूसरे का सहयोग करना। सभी प्रकार से सहयोग करने का सकंल्प करें। इन संदेशों के मायने समझना होगा। अन्यथा जिस प्रकार से वर्तमान परिस्थिति में मनुष्य का व्यक्तिगत जीवन, परिवार, समाज और देश सब की स्थिति दयनीय हो गई है। इन सब के संस्कार और संस्कृति नष्ट होती जा रही है। धीरे-धीरे हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

अनंत सागर
अंतर्मुखी के दिल की बात
(उनतालीसवां भाग)
28 दिसम्बर, 2020, सोमवार, बांसवाड़ा
‘नए वर्ष में सतर्कता बरतें, सतकर्म की ओर बढ़ें’
अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

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