अठारहवां दिन : इंसान खुद कर्म का जाल बुनता है और उसी में फंस जाता है – अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantचिंतन, मौन साधना

मुनि पूज्य सागर की डायरी से

अन्तर्मुखी ने मौन साधना के 18 वें दिन कहा- आज कुछ अजीब सा महसूस हो रहा है। घबराहट, बेचैनी सी हो रही थी। ऐसा अनुभव हो रहा था कि अनजान जगह आ गया। आज से पहले ऐसा अनुभव नहीं हुआ था। एक अजीब सी अनुभूति हो रही थी। अजीब सी अनुभूति लक्ष्य की प्रथम सीढ़ी पर प्रथम कदम रखने की थी। मन उत्साहित, आनंदित हो गया। प्रभु का स्मरण कर आंखें खुशी से नम हो गईं। अपनी भावनाएं, विचार प्रभु बांटने लगा। जैसे बच्चा अपनी मां से मिलने पर रखता है। प्रभु आपकी शरण में आने से आत्मिक शांति तो मिल गई। बस अब तो इंतजार है कर्मों के जाल से बचकर अपने आप को सुरक्षित करने का। कर्म का जाल मैं स्वयं बुनता हूं, स्वयं ही फंस जाता हूं। कड़ी की तरह वह अपने द्वारा बनाए जाल में फंस जाता है। कर्म ही सुख-दुख का अनुभव करा रहा है। कर्मों के कारण ही मैं दूसरों के द्वारा अच्छा-बुरा बन रहा हूं। आज पुनः संकल्प को दोहराता हूं कि आप के बताए मार्ग पर आस्था और श्रद्धा के साथ सदैव चलता रहूंगा। प्रभु मेरी यही प्रार्थना है कि कभी तर्क-वितर्क और कुतर्क कर्मों के उदय में बाधा ना हो। किसी बात पर मेरे निमित्त धर्म की अप्रभावन कभी ना हो। पूरे सच्चे मन और निर्मल भाव से आपकी भक्ति करते हुए पहला कदम रखा है। अज्ञानतावश कोई गलती हो जाए तो प्राश्चित से नष्ट कर लूंगा। अज्ञान बच्चा समझ मुझे माफ करना। आपकी शरण में आने से कर्म नष्ट हो ही जाते हैं, इसमे कोई संदेह नहीं है। हाथ की अंजुली में पानी जैसे अधिक नहीं रुक सकता उसी तरह पाप भी नहीं रुक सकते हैं। आपकी छत्रछाया में अब कोई अशुभ कर्म का प्रवेश हो ही नहीं सकता है। आपको दिल में बिठा लेने से आप मुझे भी सब दिल में बिठा लेंगे यह पूरा विश्वास है। आप का मन इतना बड़ा है कि आपने एक अज्ञान से बालक को अपनी शरण में स्थान दिया है। आपका यह उपकार तो मैं चुका नहीं सकता पर किसी और पर आपके द्वारा बनाई उपकार की चेन को बढ़ाने का संकल्प जरूर करता हूं। उपकार से एक दूसरे के प्रति आस्था, विश्वास और श्रद्धा बढ़ेगी, यही तो प्रभु आप का उपदेश है।

रविवार, 22 अगस्त, 2021, भीलूड़ा

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