चौबीसवां दिन : इंसान की वास्तविक पहचान आत्मिक स्वभाव से – अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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मुनि पूज्य सागर की डायरी से

मौन साधना का 24वां दिन। इंसान की वास्तविक पहचान उसके आत्मिक स्वभाव से होती है। आत्मिक स्वभाव मिलने पर वह फिर कभी नाश को नहीं प्राप्त होता है। आत्मिक स्वभाव की बाहरी पहचान, इंसान की भाषा,शब्द संयोजन,आचरण, व्यवहार,शरीर की क्रिया आदि से होती है। आत्मिक स्वभाव कर्मरहित है। कर्म के कारण आत्मिक स्वभाव विकृत हो जाता है। इंसान के पास धन, वैभव, रूप सब कुछ कर्म के अनुसार आता- जाता रहता है। इन्हीं के कारणआत्मिक स्वभाव मलिन हो जाता है। यह चीजें कुछ समय तक तो इंसान को आकर्षित कर सकती हैं, पर स्थाई रूप से नहीं।

इन सब के कारण इंसान की पहचान तो बनती है, पर वह नाश को भी प्राप्त हो जाती है। आत्मिक स्वभाव से जिसकी पहचान बनती है, होती है वह अनन्तकाल तक रहती है। भगवान महावीर, राम की पहचान उनके आत्मिक स्वभाव से हुई थी तो आज भी उनकी पहचान बनी हुई है। फिल्म स्टार, नेता, अधिकारी, धनवान, खिलाड़ी आदि की पहचान उसके कला,रूप, पद ,धन,वैभव आदि रहने तक ही रहती है। जब पहले वाले की अपेक्षा अच्छा इंसान, वैभव आदि और किसी के पास आ जाता है तो पहले वाले की पहचान चली जाती है। जब इंसान के मृतक शरीर को लोग श्मशान लेकर जाते हैं, जिस समय उसको जलाते हैं तो लोग आपस में उसके धन आदि की नहीं, बल्कि उसके आत्मिक स्वभाव की चर्चा करते हैं कि वह कैसा था। आत्मिक स्वभाव की प्राप्ति साधन से ही सम्भव है।

शनिवार, 28 अगस्त, 2021 भीलूड़ा

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